जबलपुर। सुनसान, वीरान और दहशत भरी श्मशान की खामोशी के बीच बचपन खिलखिला रहा है। ये दृष्य किसी फिल्म या टीवी सीरियल का नहीं है बल्कि शहर के मुक्तिधामों की हकीकत है। श्मशान में अनजाने डर के बीच पसरे सन्नाटे में बच्चों की कोलाहल, बचकाने खेल का किसी से कोई वास्ता नहीं है। श्मशान में मृत देह पहुंचती है, दाह संस्कार किया जाता है। दाह संस्कार तक श्मशान की खामोशी टूटती है फिर लोगों के जाते ही जलती चिताओं के बीच बचपन अंगड़ाई लेने लगता है।
जीवन की अंतिम नियति मृत्यु है। मृत्यु के बाद मुक्तिधामों पर देह का अंतिम संस्कार किया जाता है। कभी श्मशान का नाम सुनते ही लोगों के बीच अजब दहशत पैदा होती थी लेकिन अब श्मशानों के आसपास लोग रहने लगे हैं। शवयात्रा देखना उन लोगों के लिए आम बात हो गई है।
सामाजिक धारणाएं उनके जीवन में शून्य हो गई हैं। शवयात्रा देखकर उनके जहन में न तो शोक पैदा होता है और न ही दर्द। शहर में 14 मुक्तिधाम हैं। शवदाह करवाने का काम अलग-अलग परिवारों को सौंपा गया है। ये परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी कर रहे हैं। शवदाह के एवज में दी गई राशि से इनकी गुजर बसर होती है।
बदल जाते हैं चेहरे के भाव
श्मशान के आसपास रहने वाले अबोध बच्चों के शवयात्रा देखते ही चेहरे के भाव बदल जाते हैं। पहले तो वे सड़क के किनारे चुपचाप खड़े हो जाते हैं लेकिन उनकी नजर शवयात्रा में चल रहे लोगों पर रहती है, जो इस दौरान लाई के साथ चिल्लर भी उड़ाते हुए चलते हैं। शवयात्रा में लोगों के गुजरते ही ये चिल्लर बीनने में टूट पड़ते हैं।
(श्मशान में लगे झूले में झूलते हुए मासूम बच्चे।)
मजदूरी करना मजबूरी
गुप्तेश्वर श्मशान में दाह संस्कार करवाले वाले मनोज वंशकार की मां छोटी बाई का कहना था कि वह कर्ज से दब गई है। मुक्तिधाम में दाह संस्कार कम हो गए हैं। कई बार एेसे मामले भी आते हैं, जिसमें निर्धारित दर 150 रुपए भी नहीं दी जाती है। एेसे माहौल में वे कुछ कह भी नहीं पाते हैं। छह माह पहले कर्ज लेकर बेटे की शादी की थी। कर्ज चुकाने के लिए अब मजदूरी करना मजबूरी बन गया है।
ग्वारीघाट पर बीता बचपन
बम्बी सौंधिया और मुकेश का बचपन ग्वारीघाट श्मशान में बीता है। वे अपने पिता के काम का संभाल रहे हैं। दिन भर ग्वारीघाट मुक्तिधाम में रहते हैं। शवदाह करने से लेकर अस्थियों के संरक्षण की जिम्मेदारी है। आय कम होने के बाद भी ये पिता के काम को छोड़ नहीं रहे हैं। मुकेश का कहना है कि मृतक के परिजनों की दुआएं ही उनके लिए प्रेरणा का काम करती हैं।
मां-बेटा करते हैं चौकीदारी
गोकलपुर शोभापुर मुक्तिधाम का काम 69 वर्षीय जुग्गा बाई अपने बेटे और बहू के साथ संभाल रही हैं। नगर निगम ने उन्हें मौखिक रूप से यहां के संरक्षण की जिम्मेदारी दी है। इसके लिए कोई पगार नहीं दी जाती। शहर के करीब 16 परिवार अर्से से मृतक के परिजनों से मिली राशि पर जीवन यापन कर रहे हैं।
बदहाल मुक्तिधाम
शहर के कई मुक्तिधाम बदहाल है। यहां साफ-सफाई के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। मृतक के दाह संस्कार में उपयोग होने वाली सामग्री, पानी के पाउच, बाल आदि बिखरे पड़े रहते हैं। कई मुक्तिधामों में बाउंड्रीवॉल तक नहीं है। इससे अवारा मवेशी ठंडी चिताओं को तितर-बितर कर देते हैं।