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lalita jayanti: सरस्वती स्वरूप मां ललिता की इस दिन करें पूजा, घर में आएगी समृद्धि

31 जनवरी को है मां ललिता जयंती

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जबलपुर। मां ललिता दस महाविद्याओं में से एक है। ललिता जयंती का व्रत भक्तजनों के लिए फलदायक माना जाता है। मान्यता है कि यदि कोई इस दिन मां ललिता देवी की पूजा भक्ति-भाव से करता है, तो उसे देवी मां की कृपा अवश्य प्राप्त होती है और जीवन में हमेशा सुख शांति एवं समृद्धि बनी रहती है।


शंकर हैं ह्रदय में
देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है। जिसके अनुसार पिता दक्ष के अपमान से आहत होकर जब दक्ष पुत्री सती ने अपने प्राणोत्सर्ग कर दिए, तो सती के वियोग में भगवान शिव उनका पार्थिव शव अपने कंधों पर उठाए चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं। इस महाविपत्ति को देख भगवान विष्णु चक्र द्वारा सती के शव को 108 भागों में विभाजित कर देते हैं। इस प्रकार शव के टुकड़े होने पर सती के शव के अंश जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। उन्हीं में से एक मां ललिता का स्थान भी है। भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिश में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं, इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा।


जयंती पर पूजा का महत्व: माता ललिता जयंती के उपलक्ष्य में मेलों का आयोजन किया जाता है, जिनमें हजारों श्रद्धालु श्रद्धा और हर्षोल्लासपूर्वक भाग लेते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार, इस दिन देवी ललिता ने भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लिया था। राक्षस भांडा, कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न हुआ था। इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते हैं। इस दिन शास्त्रानुसार मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और भगवान शिव की भी पूजा की जाती है।


ऐसे करें पूजा-अर्चना: शक्तिस्वरूपा देवी ललिता को समर्पित ललिता जयंती के शुभ दिन भक्त व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं। यह दिन ललिता जयंती व्रत के नाम से जाना जाता है। देवी ललिताजी का ध्यान रूप बहुत ही उज्ज्वल व प्रकाशमान है। शुक्ल पक्ष के समय प्रात: काल माता की पूजा व उपासना करनी चाहिए। कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं। वह गौर वर्ण की हैं और रक्तिम कमल पर विराजित हैं। देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्ति होती है। दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चंडी का स्थान प्राप्त है। इनकी पूजा पद्धति, देवी चंडी के समान ही है। इस दिन ललितोपाख्यान, ललितासहस्रनाम, ललितात्रिशति आदि का पाठ किया जाता है।