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सिर नीचा कर जिसकी सत्ता करते सब स्वीकार यहां….

मौनी अमावस्या से जुड़ा है विश्व साहित्य के बड़े महाकाव्य का कथ्य

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kamayani

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जबलपुर। मौनी अमावस्या यानि आदि पुरुष मनु के पृथ्वी पर अवतरण का दिन। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन प्रजापिता ब्रह्मा ने मनु और शतरूपा को प्रकट कर सृष्टि रचना का सूत्रपात किया था। अपने धार्मिक महत्व के कारण इस दिन पवित्र नदियों में स्नान-दान-पूजन-पाठ की परंपरा है और यही कारण है कि शहर के नर्मदा घाटों ग्वारीघाट, तिलवारा से लेकर भेड़ाघाट, झांसीघाट आदि पर श्रद्धालुओं की गहमागहमी बनी हुई है। इसके इतर, मौनी अमावस्या का यह दिन साहित्यप्रेमियों के लिए भी बहुत अहम है। महाकौशल के साहित्यकार और हिंदी प्रेमी मौनी अमावस्या को इसी रूप में ही देख भी रहे हैं।


कामायनी का कथ्य यही
दरअसल विश्व साहित्य की एक अमूल्य धरोहर का मौनी अमावस्या से अटूट संबंध है। प्रेम और आनंद के कवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य कामायनी का कथ्य इसी से जुड़ा है। ख्यात साहित्यकार अजेयदीप बताते हैं कि आदिमानव मनु की कथा पर आधारित कामायनी वेद, उपनिषद, पुराण आदि से भी प्रेरित है पर यह मूलत: शतपथ ब्राह्मण पर आधारित है। कथा के अनुसार पृथ्वी पर जलप्रलय के बाद केवल मनु जीवित बचे थे। देवसृष्टि के अंतिम अवशेष मनु के पास 'काम पुत्री' 'श्रद्धा' आईं और बाद में इड़ा भी उनके करीब आईं। मन के प्रतीक मनु, हृदय पक्ष की प्रतीक श्रद्धा और बुद्धिपक्ष की प्रतीक इड़ा की सहायता से आनन्द लोक तक पहुँचते । छायावाद की अन्यतम रचना'कामायनी' न केवल हिंदी बल्कि विश्व की सभी भाषाओं की सबसे बड़ी साहित्यिक रचना के रूप में प्रतिष्ठित है।


सर्वशक्तिमान का गान
कामायनी की शुरुआत चिंता सर्ग की इन पंक्तियों से होती है-


हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।
नीचे जल था ऊपर हिम था,एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।


कामायनी’ के नायक मनु के माध्यम से उन्होंंने सर्वशक्तिमान ईश्वर को ऐसे याद किया-
महानील इस परम व्योम में, अन्तरिक्ष में ज्योतिर्मान
गृह नक्षत्र और विद्युत्कण किसका करते थे संधान
छिप जाते है और निकलते आकर्षण में खींचे हुए
तृण वीरुध लहलहे हो रहे किसके रस से सिंचे हुए
सिर नीचा कर जिसकी सत्ता करते सब स्वीकार यहाँ
सदा मौन हो प्रवचन करते जिसका, वह अस्तित्व कहाँ?


नारी तुम केवल श्रद्धा हो
कवि शशिकांत मिश्र के मुताबिक प्रसाद ने कामायनी में नारी को जिस गरिमामय रूप में प्रस्तुत किया वैसा विश्व साहित्य में और कोई नहीं कर सका। नायिका के नख-शिख वर्णन को भी उन्होंने शालीनता से प्रस्तुत किया और उनके मनोभावों को व्यक्त करने में भी उन्हें महारत हासिल थी। देखिए श्रद्धा का सौंदर्य -


हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लम्बी काया, उन्मुक्त
मधु-पवन क्रीडित ज्यों शिशु साल, सुशोभित हो सौरभ-संयुक्त।
मसृण, गांधार देश के नील रोम वाले मेषों के चर्म,
ढक रहे थे उसका वपु कांत बन रहा था वह कोमल वर्म।
नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग।


नरसिंहपुर के एक अन्य कवि डा. गुप्ता के मुताबिक कामायनी की ये पंक्तियों तो नारी के लिए सर्वश्रेष्ठ स्तुति गान है-
"क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प-अश्रु जल से अपने -
तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में,
पीयूष-स्रोत बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।
देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा,
संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा।
आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा -
तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।"