8 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मेरे राम : ये है भगवान श्रीराम का ननिहाल, रेत का शिवलिंग बनाकर की थी पूजा अर्चना

पत्रिका.कॉम की खास सीरीज में माता कौशल्या के पीहर और भगवान श्रीराम के ननिहाल से जुड़ी कहानी..

2 min read
Google source verification
jabalpur.jpg

पत्रिका.कॉम की खास सीरीज मेरे राम में आज हम आपको बता रहे हैं मध्यप्रदेश के उस स्थान के बारे में जहां से भगवान श्रीराम का गहरा रिश्ता रहा है। ये भगवान राम का ननिहाल था और जब प्रभु श्रीराम मां सीता को रावण की कैद से वापस लाने लंका जा रहे थे तो उत्तर से दक्षिण तक की यात्रा के दौरान वो यहां से गुजरे भी थे जिसका प्रमाण पुराणों में तो है ही साथ ही साथ आज भी यहां पर मौजूद हैं।

महाकौशल है भगवान राम का ननिहाल
मध्यप्रदेश के महाकौशल का जबलपुर, महाकौशल वैसे तो भगवान श्रीराम का ननिहाल भी है। प्रभु श्रीराम की माता कौशल्या महाकौशल के राजा सुकौशल की पुत्री थीं। महाकौशल का ये राज्य वर्तमान में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में है। महाकौशल के राजा सुकौशल और रानी अमृतप्रभा की बेटी के तौर माता कौशल्या का वर्णन पुराणों में मिलता है । यही कारण है कि महाकौशल की पूरी प्रजा माता कौशल्या को बहन और भगवान श्रीराम के भांजे के तौर पर मानती है। इसी वजह से महाकौशल क्षेत्र में आज भी मामा अपने भांजों के पैर छूते हैं और उनकी पूजा करते हैं।

नर्मदा तट पर बनाया था रेत का शिवलिंग
जबलपुर के नर्मदा तटों का हर कंकर शंकर कहलाता है और पूजा जाता है और इसकी वजह है जबलपुर का गुप्तेश्वर महादेव मंदिर जिसका जिक्र मतस्य पुराण, नर्मदा पुराण, शिवपुराण, बाल्मिकी रामायण, रामचरित मानस व स्कंद पुराण में मिलता है। पुराणों के मुताबिक जब भगवान श्रीराम, अनुज लक्ष्मण के साथ सीता माता की खोज में निकले थे तब एक बार वे मां नर्मदा तट पर भी आए थे। गुप्तेश्वर पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी मुकुंददास ने बताया कि श्रीराम ने यहीं नर्मदा तट पर एक माह का गुप्तवास भी बिताया है। और कोटि रूद्र संहिता में प्रमाण है कि गुप्तेश्वर महादेव रामेश्वरम् के उपलिंग स्वरूप हैं ।

चरवाहे ने देखा सबसे पहले मंदिर
गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी योगेंद्र त्रिपाठी ने बताते हैं कि गुप्तेश्वर महादेव का ये मंदिर सन् 1829 में अस्तित्व में आया। मंदिर पहाड़ के अंदर है और इसकी गुफा के द्वार पर एक बड़ी चट्टान थी। पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां लोगों का आना जाना कम था और कुछ चरवाहे यहां पर आया करते थे। चरवाहे ने सबसे पहले मुख्य द्वार के पत्थऱ को देखा और जब लोगों ने गुफा के द्वार से पत्थर को हटाया तो गुप्तेश्वर महादेव के दर्शन हुए। तब से अब तक गुप्तेश्वर महादेव भक्तों की आस्था का केन्द्र है।