
ofk: National Drama Festival starts in jbp
जबलपुर. 'आषाढ़ का एक दिन- मोहन राकेश की अमर रचना। कालिदास की अनन्य प्रेमिका मल्लिका की मनोव्यथा को व्यक्त करती कहानी। इधर फूलन देवी के नृशंस हत्याकांड बेहमई कांड में मारे गए ठाकुरों की विधवाओं के बदला लेने के भाव को अभिव्यक्त करनेवाली कथा। नारी मन के इन दो अलग-अलग रूपों को शहर में दो नाटकों के माध्यम से दर्शाया गया। दोनों ही नाट्य मंचनों से यह संदेश सामने आया कि स्त्री हर रूप में सशक्त है। नारी के प्रेमल मन के साथ ही उसके प्रतिशोध की भी ताकत को इन नाटकों से बखूबी उजागर किया गया।
राष्ट्रीय नाट्य समारोह का हुआ शुभारंभ
संस्कारधानी में रविवार को अलग-अलग जगहों पर इन नाटकों को मंचन किया गया। गीतायन प्रेक्षागृह में आयुध निर्माणी खमरिया के ७५ वर्ष पूर्ण होने पर राष्ट्रीय नाट्य समारोह पंच-सप्तति का शुभारंभ हुआ जिसमें मुख्य अतिथि आयुध निर्माणी बोर्ड के अध्यक्ष और महानिदेशक सुनील कुमार चौरसिया, अपर महाप्रबंधक बीपी मिश्रा ने दीप प्रज्जवलन कर नाट्य समारोह की शुरुआत की। दूसरा मंचन शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में समागम रंगमंडल के तत्वावधान में हुआ, अगरबत्ती।
कहानी 'आषाढ़ का एक दिन' की
मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है। समर्पित प्रेयसी लेकिन कालिदास की विवशता उसका अंतद्र्वन्द्व और जटिलता एक कलाकार को तोड़ देती है। मूल्य बोध से युक्त असाधारण कवि या साहित्यकार न व्यवस्था को एकदम छोड़ पाता है, न ही उससे समझौता करते हुए चल पाता है। आषाढ़ का एक दिन मल्लिका के इंतजार को बताता है, लेकिन इसके साथ ही साथ मंचन में यह भी दर्शाया गया है कि कालिदास को राज व्यवस्था किस तरह कुचलती और तोड़ देती है।
कलाकार
मंच पर शिरीष गोंटिया, माधवानंद, राजेश बैरागी, गोपाल मेहरा, दाताराम चौधरी, स्वरूप चौधरी, अमित झारिया, दृष्टि श्रीवास्तव, रिनी ए स्टीफन, ज्योस्फिन इग्नेसियस ने प्रमख पात्रों कालिदास, मल्लिका, अंबिका, मातुल आदि की भूमिकाएं निभाईं। लेखन मोहन राकेश का है और निर्देशन वीएम इग्नेशियस ने किया है।
कहानी अगरबत्ती की
बेहमई हत्याकांड में मारे गए ठाकुरों की विधवाओं के पुनर्वास के लिए लघु उद्योग निगम के जरिए सरकार ने अगरबत्ती का एक कारखाना खुलवाया है। लाला राम ठकुराइन अपने पति की अस्थियों का तर्पण नहीं करती है। वह मदद के इंतजार में सभी को संगठित कर रही है। दमयंती इस बहस को बढ़ाती है कि मारे गए सभी पुरुष ही क्यों थे। इन सबके बीच एक बात और सामने आती है कि पापी अगर नातेदार हो तब भी पापी होता है। ठकुराइन बहस में अकेली पड़ जाती है और बचपन की क्रूरता को याद कर केवल एक औरत ही रह जाती है, और अन्य आठ औरतों के साथ अपने पति की अस्थि भस्म अगरबत्ती के मसाले में मिला देती है। शेष बच जाती है तो सिर्फ नौ औरतें, वर्ग, वर्ण और जेंडर से मुक्त औरतें और अगरबत्ती।
कलाकार
मंच पर लालसा कनौजे, ज्योत्सना कटारिया, स्वाति दुबे, आशी केसरी, गुंजन राय, मानसी रावत, शिवांजलि, शोभा वर्मा, ऊषा तिवारी, रश्मि अग्रवाल, लतिका मंडलोई, अतुल गोस्वामी, पुष्पराज, शुभम, अर्पित, शिवाकर, अर्पित, उत्सव आदि शामिल रहे। निर्देशन और लेखन आशीष पाठक का रहा। सेट रोहित झा और शिवम बावरिया ने डिजाइन किया।
Published on:
08 Jan 2018 11:18 am
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