
parshuram jayanti 2017 date
जबलपुर। अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम की जयंती धूमधाम से मनाई जायगी। भगवान राम ही नहीं... भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी पहले... यानी त्रेता युग से भी युगों पहले आज के ही दिन भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि और मां रेणुका के घर में पुत्र के रुप में आए थे। भगवान परशुराम को लेकर लोगों में भ्रांति भी है कि वे परम क्रोधी थे, लेकिन उनकी दयालुता और दानवीरता बताने के लिए यह एक ही उदाहरण काफी है कि अकेले ही 21 बार धरती को जीतने के बाद उसे ब्राम्हणों को दान भी कर दिया। बाद में ब्राम्हणों ने इसका अधिकार क्षत्रियों को देकर ब्राम्हणत्व को सही रुप में परिभाषित किया। जयंती के उपलक्ष्य में आपको बताते हैं भगवान परशुराम से जुड़े कुछ रोचक व अद्भुत प्रसंग...
विष्णु का ही नाम
भगवान श्री राम से पहले और वामन भगवान के जन्म से पहले भगवान विष्णु का एक अवतार हुआ था। यह अवतार संसारा में क्रोध का प्रतीक माना जाता है। इन्होंने स्वयं विष्णु के ही दूसरे अवतार को युद्घ के लिए ललकारा था। भगवान विष्णु के इस अवतार का नाम है परशुराम।
चिरंजीवी हैं परशुराम
मान्यता है कि भगवान परशुराम भी हनुमान जी की तरह चिरंजीवी हैं। पिताजी का आदेश का पालन करने के लिए आपने अपनी मां का ही सिर धड़ से अलग कर दिया था। बाद में पिताजी से वरदान मांगकर उन्हें जीवित भी करा दिया। इसलिए ये पिता के साथ माता जी को भी परमप्रिय हैं। पुत्र की आज्ञाकारिता व मां को पुनर्जीवन दिलाने की समझदारी से प्रसन्न होकर पिता ऋषि जमदग्नि ने ही उन्हें अमर रहने का वरदान दिया था।
हत्या का पाप
बताया जाता है कि मां का वध करने के कारण भगवान परशुराम को मातृ हत्या का दोष भी लगा था। इसके निवारण के लिए उन्होंने कैलास पर्वत के समीप ब्रम्हकुण्ड में घोर तपस्या की। यहीं पर उन्हें इस दोष से मुक्ति मिली थी। ब्रम्हपुत्र नद का उद्गम यहीं से हुआ था।
प्रभु का आवेशावतार
शास्त्रों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। उनके पिता का नाम जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था। परशुराम के चार बड़े भाई थे लेकिन गुणों में यह सबसे निपुण थे। इन्हें आवेश भी जल्दी आता था, इसलिए इन्हें विष्णु का आवेशावतार भी माना जाता है।
शिव व राम का संगम
"परशु" पराक्रम का प्रतीक है और राम सत्य का..। इस प्रकार भगवान परशुराम में दोनों ही गुण थे। सत्य की स्थापना के लिए उन्होंने पराक्रम का उपयोग किया और अन्याय के रास्ते पर चलने वाले क्षत्रियों का संहार किया। आपको भगवान विष्णु का छठवां अवतार माना जाता है। दूसरा यह भी कि परशु भगवान शिव का प्रतीक है और राम विष्णु का। इसलिए इन्हें शिव हरि कहा जाता है।
राम था नाम
पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पाँचवें पुत्र का नाम 'राम' ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र 'परशु' (फरसा या कुठार) प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। 'परशु' प्राप्त किया गया शिव से। शिव संहार के देवता हैं। परशु संहारक है, क्योंकि परशु 'शस्त्र' है। राम प्रतीक हैं विष्णु के। विष्णु पोषण के देवता हैं यानी राम यानी पोषण और रक्षण और शिव यानी संहार। दोनों ही विशेषताएं भगवान परशुराम में हैं। वे समन्वय व संतुलन का प्रतीक हैं।
ये भी है विशेषता
भगवान परशुराम अक्षय तृतीया को जन्मे इसलिए इनकी शस्त्रशक्ति भी अक्षय है और शास्त्र संपदा भी अनंत है। शास्त्रों में लिखा है कि भगवान विश्वकर्मा द्वारा अभिमंत्रित दो दिव्य धनुषों की प्रत्यंचा पर केवल परशुराम ही बाण चढ़ा सकते थे। इनके अलावा दूसरा कोई इसमें प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया।
यहां हुआ जन्म
माना जाता है कि भगवान परशुराम का जन्म उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर के जलालाबाद में हुआ था। उनकी प्रारंभिक कर्मभूमि और तपोभूमि जौनपुर में गोमती के पाव तट पर जमैथा गांव में थी। यहां आज भी महर्षि जमदग्नि का आश्रम है। इसे पहले यमदग्निपुरम के नाम से जाना जाता था। बाद में यह जौनपुर हो गया।
क्षत्रिय नहीं बल्कि अन्याय का विरोध
भगवान परशुराम के बारे में प्रचलित है कि उन्होंने 21 बार भूमि को क्षत्रिय विहीन कर दिया था, लेकिन उनके रहते हुए भी जनक व दशरथ जैसे क्षत्रिय राजा थे। वास्तव में परशुराम हर क्षत्रिय के विरोधी नहीं थे। उन्होंने अन्याय के पथ पर चलने वाले क्षत्रियों को ही सबक सिखाया और न्याय के पथ पर चलकर राज्य करने की सीख दी। आपने ही सहस्त्रबाहु का वध किया था।
Published on:
01 Apr 2018 03:11 pm
बड़ी खबरें
View Allजबलपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
