
तर्पण, श्राद्धकर्म में मातृशक्ति भी निभा रहीं हैं दायित्व
जबलपुर। पंद्रह दिवसीय पितरों के तर्पण का सोमवार को तीसरा दिन था। तृतीया के श्राद्ध पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक श्रद्धालुओं का तांता नर्मदा तटों पर लगा रहा। ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, सरस्वती घाट, लम्हेटाघाट समेत इंद्र गयाजी कुंड में लोग अपने पूर्वजों, पितरों व ज्ञान अज्ञात रिश्तेदारों का ङ्क्षपडदान, तर्पण, श्राद्ध करने पहुंच रहे हैं। इनमें पुरुषों व युवाओं के साथ महिलाएं भी तर्पण कार्य करने पहुंच रही हैं। यह लोगों के बीच चर्चा का विषय भी बना हुआ है। अकेले ग्वारीघाट में बड़ी संख्या में महिलाएं श्राद्ध कर्म करते देखी जा सकती हैं।
विभिन्न परिस्थितियों में महिलाओं का अधिकार है श्राद्धकर्म करना
अभिषेक मिश्रा ने बताया कि महिलाएं दो कारणों से तर्पण या पितरों का श्राद्ध करती हैं। इनमें पहला कारण है कि उनके परिवार में यदि कोई पुरुष नहीं है तो वे अपने पूर्वजों, पितरों का तर्पण, ङ्क्षपडदान, श्राद्ध आदि कर सकती हैं। इसी तरह दूसरा कारण है कि उनके परिवार के पुरुष या बच्चे कोई भी श्राद्ध कर्म नहीं कर रहा है या करना नहीं चाहता है तो उस घर की महिला को अधिकार है कि वह अपने पितरों का तर्पण कर उन्हें मोक्ष गति प्रदान करने में सहयोग करे। इन्हीं भावनाओं के साथ नर्मदा तटों पर महिलाएं तर्पण आदि करने पहुंच रही हैं।
कई घरों में वर्षों से है परम्परा
तीर्थ पुरोहित अभिषेक मिश्रा ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में पितरों के तर्पण आदि श्राद्धकर्म में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। वैसे तो ये कार्य घर के पुरुषों व बच्चों को करना होता है, लेकिन विशेष परिस्थियों में पितरों के मोक्ष के लिए महिलाएं भी श्राद्धकर्म कर सकती हैं। इसके अलावा कुछ घरों परिवारों में दशकों से ये परम्परा भी है, पुरुषों के साथ महिलाएं भी जोड़े से बैठकर पितरों का तर्पण करती चली आ रही हैं।
ज्ञात अज्ञात आत्माओं का तर्पण करने के लिए निर्धारित हैं विशेष तिथियां
सोलह दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान लोग पितरों का श्राद्ध उनकी पुण्य तिथियों के अनुसार करते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी मामले होते हैं जिनमें श्रद्धालुओं को अपने पितृ या जिनका श्राद्ध करना है उनके निधन की तिथि ज्ञात नहीं होती। साथ ही कुछ ऐसे मामले होते हैं जिनमें पितृ ही अज्ञात रहते हैं, मूलत: यह पूर्व पीढिय़ों के मामले में होता है। उक्त सभी परिस्थितियों में पितरों की आत्मा की शांति व मोक्ष के लिए सनातन शास्त्रों में कुछ तिथियां विशेष तौर पर निर्धारित की गई हैं। जिनमें ज्ञात-अज्ञात आत्माओं के मोक्ष के लिए श्राद्ध, भोग, ङ्क्षपडदान किया जा सकता है।
ज्योतिषाचार्य सचिनदेव महाराज के अनुसार तिथि ज्ञात-अज्ञात होने की स्थिति में महिलाओं के श्राद्ध कर्म के लिए नवमीं तिथि निर्धारित है। इस बार 19 सितम्बर को यह तिथि है, इस दिन ज्ञात के अलावा अज्ञात माताओं का तर्पण, श्राद्ध व ङ्क्षपडदान आदि किया जा सकता है। इसी तरह संतों व संन्यासियों के श्राद्ध कर्म के लिए द्वादशी तिथि निर्धारित है, जो इस बार 22 सितम्बर को है।
अग्रि, सडक़ दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या समेत अन्य कारणों से अकाल मृत्यु प्राप्त करने वाली आत्माओं की आत्माओं की शांति के लिए चतुर्दशी तिथि तय है, यह तिथि इस बार 24 सितम्बर को पड़ रही है। इनके अलावा ज्ञात-अज्ञात सम्पूर्ण पितरों, मित्रों, रिश्तेदारों व परिचितों का मोक्ष तर्पण महालय अमावस्या पर किया जा सकता है, यह तिथि इस वर्ष 25 सितम्बर को है।
इन बातों का रखना चाहिए ध्यान
पितृ पक्ष में तर्पण, श्राद्ध और ङ्क्षपडदान के कार्य पवित्र नदियों, जलाशयों में पुरोहितों द्वारा ही वैदिक विधि से पूर्ण कराए जाने चाहिए। शास्त्रों के अनुसार विधि विधान से तर्पण आदि करने पर ही पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। यथासम्भव जरूरतमंदों को दान करने से पितृदोष का प्रभाव कम हो जाता है।
Updated on:
13 Sept 2022 06:24 pm
Published on:
13 Sept 2022 06:22 pm
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