
rishi panchami - rishi panchami vrat katha puja vidhi muhurat
जबलपुर। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी ऋषि पंचमी के रूप में मनाई जाती है। ऋषि पंचमी का व्रत सभी के लिए फलदायक होता है। आज के दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर कथा श्रवण करने का बहुत महत्त्व होता है। यह व्रत ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण एवं सम्मान की भावना को प्रदर्शित करने का महत्त्वपूर्ण आधार बनता है।
ऋषि पंचमी पूजन-पूर्वकाल में यह व्रत समस्त वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था, किन्तु समय के साथ-साथ अब यह अधिकतर स्त्रियों द्वारा किया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी बहुत महत्त्व होता है। सप्तऋषियों की प्रतिमाओं को स्थापित करके उन्हें पंचामृत में स्नान करना चाहिए। तत्पश्चात उन पर चन्दन का लेप लगाना चाहिए, फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, धूप, दीप, इत्यादि अर्पण करने चाहिए तथा श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र जाप करना चाहिए।
ऋषि पंचमी कथा- विदर्भ देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थे। ब्राह्मण अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है परंतु काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। एक दिन आधी रात में लडक़ी के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते हैं। अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता-पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं और पुत्री को उत्तक ऋषि के पास ले जाते हैं। उत्तक ऋषि अपने ज्ञान से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण विवरण उसके माता-पिता को बताते हैं और कहते हैं कि कन्या ने एक बार रजस्वला होने पर भी घर-बर्तन इत्यादि छू लिए थे और काम करने लगी, बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गए हैं।
ऋषि कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है। एक अन्य कथा के अनुसार यह कथा श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। कथा अनुसार जब वृजासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा तो उसने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्माजी से प्रार्थना की। ब्रह्माजी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार भाग में बांट दिया था, जिसमें प्रथम भाग अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के लिए वर्षा के जल में, तीसरे पर्वतों में और चौथे भाग को स्त्री के रज में विभाजित करके इंद्र को शाप से मुक्ति प्रदान करवाई थी। इसलिए उस पाप को शुद्धि के लिए ही हर स्त्री को ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए।
Published on:
14 Sept 2018 08:28 am
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