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Sheetla Saptami; पेड़ के नीचे से मंदिर में पहुंच गयीं माता की मूर्ति

- अंग्रेजों के जमाने में की गयी थी प्रतिमा की स्थापना

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Shitla mata mandir ghamapur

Shitla mata mandir ghamapur

जबलपुर। गुरुवार को शीतला सप्तमी मनायी जा रही है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शीतला सप्तमी कहते हैं। इस दिन शीतला माता के निमित्त व्रत करने का विधान है। शीतला सप्तमी के मौके पर शहर के घमापुर क्षेत्र में स्थित शीतला माता मंदिर में खासी गहमागहमी है। यहां माता शीतला की पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्तों का आना सुबह से ही जारी है। इस प्रसिद्ध मंदिर और माता की प्रतिमा के बारे में अनेक बातें कही-सुनी जाती हैं। यह मंदिर ७० के दशक में बनाया गया था पर ब्रिटिश काल में प्रतिमा की स्थापना की गइ थी। मंदिर बनने के पहले एक नीम के पेड़ के नीचे माता शीतला की प्रतिमा स्थापित थी।


गौंडकालीन है प्रतिमा
मंदिर की मूल प्रतिमा अब पृष्ट भाग में रख दी गइ्र है। मुख्य द्वार पर नवीन प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। पुरानी प्रतिमा गौंडकालीन बतायी जाती है। मंदिर में लोग मन्नत के नारियल बांधते हैं। पहले चेचक जैसी महामारी के इलाज के लिए बड़ी संख्या में लोग मंदिर आते थे और माता शीतला की पूजा-आराधना करते थे। अब चेचक तो ज्यादा नहीं होता पर अन्य बीमारियों के इलाज के लिए माता के भक्तों का यहां तांता लगा रहता है।


आरोग्यता मिलती है

कुछ स्थानों पर शीतला अष्टमी का व्रत करने का भी विधान है। शीतला सप्तमी या शीतला अष्टमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं । उनकी प्रसन्नता से आरोग्यता प्राप्त होती है। मान्यता है कि जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते हैं।


ऐसी हैं माता शीतला
शीतला देवी के स्वरूप का शीतलास्तोत्र में इस प्रकार वर्णन किया गया है-
वंदेहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगंबराम्।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम्।।
इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिए जाते हैं और दूसरे दिन इनका भोग शीतला माता को लगाया जाता है, इसीलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता के अनुसार शीतला सप्तमी के दिन घरों में चूल्हा भी नहीं जलाया जाता, यानी सभी को एक दिन बासी भोजन ही करना पड़ता है।