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SIMHASTHA 2016 – ऋषि के श्राप से बना था ये शिव रूप, सिंहस्थ में देगा दर्शन

सब पर दयादृष्टि बनाए रखने वाले भगवान शिव का अपने ससुर से हुआ था मतभेद, भरी सभा में दिया था ससुर ने दामाद को श्राप

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Lali Kosta

Apr 18, 2016

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लाली कोष्टा @ जबलपुर। भगवान शिव पंच देवों में सूर्य, गणेश, गौरी , विष्णु और शिव प्रधान देव हैं। महादेव का एक रूप अघोरी या नागा साधू रूप आज भी हमारे बीच मौजूद है। लेकिन ये कोई नहीं जानता कि भगवान के इस रूप की उत्पत्ति कब, कैसे हुई। महादेव का ये रूप सिंहस्थ उज्जैन में स्नान करने बड़ी संख्या में पहुंचेगा। आइए जाने कैसे सृष्टि में आया शिव का ये रूप।

ससुर को नहीं किया प्रणाम
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव के ससुर प्रजापति दक्ष एक सभा में गए। उनको वहां आया देखकर सभासद उनके आदर में खड़े हो गए, परंतु ब्रह्मा जी और भगवान शिव अपने स्थान पर बैठे रहे। दक्ष ने सोचा ब्रह्मा जी तो मेरे पिता हैं, इसलिए वह मेरे आदर में खड़े नहीं हुए, मगर शिव को मैंने अपनी कन्या दी है। इस नाते इसका मुझ़े प्रणाम करना बनता था।
दक्ष को बड़ा क्रोध आया, उसने हाथ में जल लेकर भगवान शिव को श्राप दिया की आज से यह शिव यज्ञ का भागी नहीं होगा और वे अपने घर चले गए।


नंदी को आया क्रोध
भक्त नंदी को क्रोध आया और उसने कहा दक्ष के वचनों को सुनने वालों को मैं श्राप देता हूं कि इस दुष्ट ने महादेव को साधारण मनुष्य समझकर श्राप दिया है। इस कारण वह ज्ञानी और तत्व विमुख होकर स्त्री कामना करने वाला कामी, देहाभिमानी होकर बकरे के समान देह वाला होगा।
साथ ही ब्राह्मणों ने अभिमान के कारण अनुमादन किया है। वह विद्वान तथा ज्ञानी होने पर बुढ़ापे में ज्ञान रहित हों और दरिद्र होकर अपने ज्ञान को धन कामना से बचने वाले हों। भूख बुझाने के लिए सब वर्णों का अन्न भक्ष करने वाले घर में भिक्षा मांगने वाले हों।

भृगु ऋषि को आया गुस्सा

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तभी भृगु ऋषि को बहुत क्रोध आया, उन्होंने सभी शिव भक्तों को श्राप देते हुए कहा कि जो भी शिव जी का व्रत तथा उनका पूजन करेंगे वे सभी धर्म के प्रति पादक, वेद शास्त्रों के विपरित चलने वाले पाखंडी हो जाएं। वे जटा धारण कर भस्म देह में मलकर शिव दीक्षा में प्रवेश करेंगे। वे लोग मदिरा, मांस भक्षण करेंगे और कानों को फाड़कर मुद्रा पहनेंगे तथा श्मशान में निवास करेंगे। इस प्रकार शिव का अघोर या नागा साधू रूप सभी के सामने आया।


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पांच में एक रूप है अघोर
भगवान शिव के पांच रूपों में एक अघोर रूप है। अघोरियों को इस पृथ्वी पर भगवान शिव का जीवित रूप भी माना जाता है। अघोरी आम दुनिया से कटे हुए हैं। वे अपने आप में मस्त रहने वाले अधिकांश समय दिन में सोने और रात को श्मशान में साधना करने वाले होते हैं। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पसंद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है। अघोरियों की साधना में इतना बल होता है कि वो मुर्दे से भी बात कर सकते हैं।

सिंहस्थ में करेंगे शाही स्नान
शिव के सकल उपासक अघोरी आज विभिन्न अखाड़ों के साधू संत व नागा साधुओं के रूप में जनमानस के बीच रहते हैं। वे तंत्र मंत्र क्रियाओं के साथ जन कल्याण के लिए यज्ञ आदि का आयोजन भी करते हैं। ये सहस्त्र अघोरी महाकाल नगरी उज्जैन में एकत्रित हो रहे हैं जो सिंहस्थ में शिप्रा के पावन तट पर स्नान करने जनमानस के साथ आएंगे।

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