
ओशो पर बन रही फिल्म
जबलुपर। ओशो का नाम आए और संस्कारधानी का जिक्र नहीं हो, ऐसा असंभव है। संस्कारधानी के नाम से विख्यात जबलपुर ही उनकी कर्म स्थली और तपो स्थली रहा है। भवंरताल गार्डन के बीच में लगा मौलिश्री का वृक्ष और देवताल की पहाड़ी पर मौजूद ओशो शिला आज भी उनकी यादों को ताजा करती है। यही वे स्थान हैं, जहां ओशो ने आत्म ज्ञान प्राप्त किया और एक सामान्य प्रोफेसर से आचार्य रजनीश और फिर ओशो बनने तक का चमत्कारिक सफर तय किया। आध्यात्म को अपने अनूठे अंदाज में पेश करके वे दुनिया में छा गए। आज भी देश-विदेश से हजारों की संख्या में शैलानी ओशो शिला और मौलिश्री यानी संबोधि वृक्ष को देखने के लिए आते हैं। विशेष बात यह है कि पूरे विश्व में मशहूर आध्यात्मिक गुरु ओशो पर एक खास फिल्म बन रही है। फ्रांस में 71 वें कान फिल्म फेस्टिवल में इसकी घोषणा मशहूर फिल्म निर्माता सुभाष घई ने की है। फिल्म का नाम भी तय कर लिया गया है। ओशो पर आधारित फिल्म का नाम.. ओशो: अदर साइड ऑफ ओशियन रखा गया है।
इन्होंने लिखी पटकथा
जानकार सूत्रों के अनुसार ओशो: अदर साइड ऑफ ओशियन फिल्म की कहानी रंग दे बसंती.. फेम कमलेश पांडे ने लिखी है। इसमें अभिनय के लिए अमेरिकन एक्टर अल पचीनो और डस्टन ली हॉफमेन को एप्रोच किया गया है। बताया गया है कि कान फेस्टिवल में वॉलीवुड के कई नामी गिरामी स्टूडियोज ने इस फिल्म के निर्माण में रुचि दिखाई है। फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए इतालवी डायरेक्टर लक्षेन सुकामेली को बोर्ड पर लाया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि इंटरनेशनल लेबल पर यह फिल्म जल्द ही पर्दे पर नजर आएगी। खबर ये भी है कि ओशो के अध्ययन, प्रोफेसरशिप और तप, ध्यान से जुड़े जबलपुर के खास स्थानों के सीन भी फिल्म में नजर आ सकते हैं।
आज भी जीवंत हैं यादें
उल्लेखनीय है कि संस्कारधानी आचार्य रजनीश की कर्म, ज्ञान और साधना भूमि रही है। यह पूरे विश्व में उनके अनुयायियों का प्रमुख स्थल है। उनकी तपोस्थली की शिला में आज भी ओशो को महसूस किया जाता है। स्वामी विश्वदेव बताते हैं कि आचार्य रजनीश देवताल में अंतरराष्ट्रीय ओशो अध्यात्म केंद्र बनाना चाहते थे, लेकिन अनुयायियों को होने वाली कठिनाईयों को देखते हुए उन्होंने महाराष्ट्र के पुणे शहर को चुना था। ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा नरसिंहपुर जिले के नगर गाडरवारा स्थित ननिहाल में हुई। उनका बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था। उन्होंने सागर यूनिवर्सिटी के साथ जबलपुर में भी उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने जबलपुर के महाकौशल कॉलेज व डीएन जैन कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में अध्यापन का कार्य कराया। यहां उनकी लायब्रेरी व बैठने की चेयर आज भी संरक्षित है। जानकार बताते हैं कि अध्यापन के बाद ओशो अक्सर भवंरताल गार्डन स्थित मौलिश्री के वृक्ष के नीचे जाकर बैठते थे। यहीं उन्हें आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ। देवताल पहाड़ी पर एक शिला पर बैठकर वे साधना करते थे। यह शिला वहां आज भी मौजूद है।
संस्कृत के थे लेक्चरर
जानकारों के अनुसार आचार्य रजनीश ने वर्ष 1957 में संस्कृत के लेक्चरर के रूप में रायपुर विश्वविद्यालय ज्वाइन किया। यहां उनकी गैर परंपरागत धारणाओं, शिक्षण और जीवन यापन करने के अलग तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए प्रतिकूल समझा गया। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका ट्रांसफर जबलपुर कर दिया। अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में जबलपुर यूनिवर्सिटी में आ गए। महाकौशल कॉलेज और फिर डीएन जैन कॉलेज में अध्यापन कार्य कराया। इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण भी दिए व आचार्य रजनीश के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।
जबलपुर से पहुंचे मुंबई
जानकार बताते हैं कि आचार्य रजनीश वर्ष 1970 में जबलपुर से मुंबई चले गए। वहां उन्होंने सबसे पहली बार डाइनमिक मेडिटेशन की शुरुआत की। उनके अनुयायी अकसर उनके घर मेडिटेशन और प्रवचन सुनने आते थे। वर्ष 1971 में उन्हें उनके अनुयायियों ने 'भगवान श्री रजनीश की उपाधि प्रदान की थी।
पुणे में बनाया आश्रम
मुंबई की जलवायु आचार्य रजनीश को रास नहीं आई और वे पुणे शिफ्ट हो गए। उनके अनुयायियों ने यहां उनके लिए आश्रम बनाया जहां आचार्य रजनीश 1974 से 1981 तक दीक्षा देते रहे। कुछ ही समय बाद आचार्य रजनीश के पास विदेशी अनुयायियों की भी भीड़ जमा होने लगी, जिसकी वजह से आश्रम का प्रसार भी तेज गति से होने लगा। इसके बाद वे विदेश चले गए। वर्तमान में पुणे स्थित उनके आश्रम को वैश्विक तौर पर ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर के नाम से जाना जाता है।
अमरीका में रजनीशपुरम
ओशो आश्रम से जुड़े स्वामी नमन ने बताया कि आचार्य रजनीश जून, 1981 में अपने इलाज के लिए अमरीका गए। इस दौरान अनुयायियों ने उन्हें वहीं रोक लिया। वहां रहकर ओरेगन सिटी में उन्होंने 'रजनीशपुरम की स्थापना की। पहले यह एक आश्रम था लेकिन देखते ही देखते यह एक पूरी कॉलोनी बन गई जहां रहने वाले ओशो के अनुयायियों को रजनीशीज कहा जाने लगा।
600 से ज्यादा लिखी पुस्तकें
बताया गया है कि ओशो ने करीब 600 पुस्तकें लिखी हैं। संभोग से समाधि तक उनकी सबसे चर्चित कृति रही। उनके साहित्य के प्रति लोगों के आकर्षण का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी रचनाएं व साहित्य लगभग 100 विदेशी भाषाओं में अनुवादित हो चुका है। उनका साहित्य रशिया, चाइना एवं अरब जैसे कम्युनिस्ट देशों में भी पढ़ा व सुना जा रहा है। ओशो के जीवन पर सैकड़ों लोगों ने पीएचडी की है। इसमें ओशो के शिक्षा दर्शन, नारी दर्शन, आध्यात्मिक, दार्शनिक और जीवन दर्शन सहित विभिन्न पहलू शामिल हैं।
हर पहलू पर रखे विचार
ओशो ने मानव जीवन से जुड़े हर पहलू को छूने और स्पष्ट करने का प्रयास किया। लोगों को आत्म शांति के साथ अध्यात्म का रास्ता दिखाया। उन्होंने संस्कृति की अपेक्षा स्वयं के विकास पर ज्यादा जोर दिया। ताकि विकृत संस्कृतियों को बढ़ावा न मिले। स्वामी शिखर ने बताया कि ओशो ने पाया कि पाश्चात्य संस्कृति में भौतिक शांति जरूर मिल जाती है लेकिन अंत में मन की शांति के लिए वे भारत का रुख करते हैं। पूरे विश्व में ओशो आत्म शांति के सबसे बड़े उदाहरण हंै।
Published on:
20 May 2018 10:37 pm
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