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बड़ी से बड़ी दुर्घटना से बचा लेता है ये छोटा सा मंत्र, देखें वीडियो

भक्त की पुकार पर खंभे से प्रकट हुए थे भगवान, नरसिंहमंदिर शास्त्री ब्रिज में धूमधाम से मनाया गया प्राकट्योत्सव

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जबलपुर। शहर के शास्त्री ब्रिज स्थित प्राचाीन नरसिंह मंदिर में भगवान नृसिंह का प्राकट्योत्स शनिवार को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर जगद्गुरू डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी के सानिध्य में सहस्त्रार्चन, मानस पाठ, अभिषेक, वैदिक, पूजन हवन समेत अन्य कार्यक्रमों का क्रम दिन भर चलता रहा। शाम को नृसिंह भगवान की भव्य महाआरती की गई, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। उत्सवपूर्ण माहौल में भंडारा व प्रसाद वितरण का क्रम रात तक चलता रहा। इस अवसर पर जगद्गुरू डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य महाराज ने नृसिंह जयंती और नृसिंह मंत्र की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि इस मंत्र का जाप करने से बड़ी से बड़ी घटना टल जाती है। यात्रा के शुभारंभ पर यदि भगवान नृसिंह का स्मरण मात्र भी कर लिया जाए तो राह की बाधाएं दूर हो जाती हैं।

ये है महामंत्र

उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्
नृसिंहम् भीषणं भद्रं मृत्यु-मृत्युं नमाम्यहम् ॥

जगद्गुरू डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य ने कहा कि उक्त मंत्र के जाप ही नहीं भगवान नृसिंह के विग्रह के दर्शन मात्र से ही अनेक व्याधियां दूर हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि धरती पर जब-जब धर्म का क्षय हुआ है। भक्तों पर अन्याय हुआ है। तब-तब भगवान नारायण ने अवतार धारण करके भक्तों और धर्म की रक्षा की है। ऐसा ही एक अवतार भगवान विष्णु ने बैसाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को लिया था, जिसे नरसिंह अवतार के नाम से जाना जाता है। यह पहला अवतार है जब भक्त की पुकार पर भगवान सीधे भक्त की पुकार पर खंभे का फाडकऱ प्रकट हुए थे। भगवान नारायण के इस अवतार को परम कल्याणकारी माना जाता है। मनीषियों का मानना है कि चतुर्थी तिथि पर भगवान नृसिंह के नाम के स्मरण मात्र से कई जन्मों के संताप मिट जाते हैं। शत्रु बाधा का शमन होता है।

इसलिए लिया था अवतार
जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य के अनुसार ऐसी कथा है कि वैदिक युग में कश्यप ऋषि के दूसरे पुत्र हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की थी। तपस्या से ब्रम्हाजी को प्रसन्न करके उसने वरदान मांगा था कि .. उसे न कोई घर में मार सके न बाहर, न अस्त्र से और न शस्त्र से, न दिन में न रात में, वह न मनुष्य से मरे और न पशु से, न आकाश में और ना ही धरती पर...। ब्रम्हाजी से यह वरदान पाकर हिरण्यकशिपु ने प्रभु भक्तों, साधु, संतों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया। उसके घर पर प्रहलाद ने जन्म लिया। प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। यह जानकर हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हुआ। उसने प्रहलाद को खंभे से बांध दिया और उसे मारने के लिए जैसे ही तलवार उठाई, उसी समय भगवान विष्णु, नृसिंह स्वरूप में वहां प्रकट हो गए। उन्होंने अपने प्रिय भक्त प्रहलाद की रक्षा की और अन्यायी हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। यह पहला अवतार था जिसमें प्रभु का कोई निश्चित स्वरुप नहीं था। वे केवल भक्त के भाव और उसकी पुकार पर प्रकट हुए, इसलिए उनके इस स्वरूप को भक्त वत्सल और कल्याण रूप माना जाता है।

ये रहे उपस्थित
बैसाख शुक्ल चतुर्दशी पर शनिवार को मंदिर में आस्था और उत्साह का संगम दिखा। दिन भर विविध अनुष्ठान चलते रहे। इस अवसर पर स्वामी मुकुंददास महाराज, डॉ. स्वामी नरसिंहदास डॉ. राधे चैतन्य महाराज, पं. वासुदेव शास्त्री, हनुमानदास महाराज, पं. अनूपदेव शास्त्री, श्याम साहनी समेत हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।