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पीएम मोदी अब हुए इन कच्चे घरों के कायल

मिट्टी से दीवारों की छपाई व छत को बनाने ताड़ पत्तों का उपयोग किया जाता है। नींव में अनाज को डाला जाता है। मान्यता है कि इससे घर मे रहने वालों को धन- धान्य की कमी नहीं होगी।

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पीएम मोदी अब हुए इन कच्चे घरों के कायल

मिट्टी से दीवारों की छपाई व छत को बनाने ताड़ पत्तों का उपयोग किया जाता है

अजय श्रीवास्तव।सुकमा जिले के कोंटा इलाके से गुजरते हुए सड़क के दोनों ओर कच्ची मिट्टी की दीवारों व ताड़ के पत्तों से लदे हुए छप्पर वाले कच्चे मकान ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का मन मोह लिया है। दरअसल ये आवास दोरला जनजाति के हैं। इन घरौंदों ने अपनी सादगी, स्वच्छता के मापदंड पर श्रेष्ठता का परचम पूरे देश में लहरा दिया है।

10 मंत्रालय के बीच मुकाबला:केंद्र सरकार के दस चुनींदा मंत्रालयों के बीच हुए स्वच्छता सर्वेक्षण में मिनिस्ट्री आफ कल्चर के इस इंट्री को स्वच्छता, सादगी, संस्कृति व इको फ्रेंडली का श्रेष्ठ उदाहरण मानते हुए पुरस्कृत किया गया है।
दोरला जनजाति के लोग बनाते हैं इसे: दोरला जनजाति के इन मकान का प्रोजेक्ट जगदलपुर िस्थत मानव विज्ञान सर्वेक्षण के क्षेत्रीय कार्यालय ने भेजा था। इस उपलिब्ध को तब ज्यादा सराहना मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुभकामनाएं देते हुए अपने आफिशियल टि्वट पर इसे अंकित किया है। इन मकान के फोटोग्राफ को इस स्पेशल कैंपेन पर प्रकाशित किताब के मुखपृष्ट पर दर्शित किया गया है।

ऐसे पूरी हुई चयन प्रक्रिया: केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय के बीच दो अक्टूबर से नवंबर माह तक एक स्पेशल कैंपेन चलाया गया। इसमें दस मंत्रालय आखिरी दौर में पहुंचे। इन दस मंत्रालय में आखिरी पायदान पर रेलवे व संस्कृति मंत्रालय के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। संस्कृति मंत्रालय के भी 48 विभागों के बीच मानव सर्वेक्षण विभाग के मैसूर व बस्तर के माडल को चुना गया। इसमें दोरला जनजाति के इस मकान ने बाजी मार ली।

धन- धान्य से रहे भरपूर इसलिए नींव में रखते हैं खाद्य सामान: जंगल से लाई बल्लियों से कालम, बांस की खपिच्चचों से पार्टिशन, मिट्टी से दीवारों की छपाई, फर्श को लीपने गोबर व छत को बनाने के लिए ताड़ के पत्तों का उपयोग किया जाता है। घर बनाने के पहले इसकी नींव में धान व दलहन जैसे अनाज को डाला जाता है। मान्यता है कि इससे इस घर मे रहने वालों को धन- धान्य की कमी नहीं होगी। इन इलाके में गर्मी व बारिश भरपूर होती है। ऐसे में मिट्टी की दीवारें मकान को ठंडक देती हैं। ताड़ के पत्तों मे बारिश की बूंदें नहीं ठहरती तो मकान सूखे व कीटाणु मुक्त रहते हैं। डा पियुष रंजन साहू, प्रभारी क्षेत्रीय कार्यालय ने बताया कि दोरला जनजाति के लोग अपने मकान बनाते समय उसके नीचे अनाज को छिड़क देते हैं, मान्यता है कि इससे मकान के रहवासी धन-धान्य से भरपूर रहेंगे। यह मकान पूरी तरह से इको फ्रेंडली होते हैं। हमारे विभाग ने इसका फोटो, विडियो व आर्टिकल प्रतियोगिता के लिए भेजा था।