
मिलिंद कुमार शर्मा, प्रोफेसर, एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर - यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि एक प्राचीन सभ्यता को नष्ट करने की धमकी के बाद अमरीका और ईरान के मध्य हुआ अस्थायी युद्धविराम वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है। अंतत: कई सप्ताह तक चले तनाव और सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों ने एक अस्थायी समझौते पर सहमति जताई है, जिसके अंतर्गत सैन्य कार्रवाई को रोकने और कूटनीतिक वार्ता को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यह युद्धविराम न केवल पश्चिम एशिया अपितु पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस क्षेत्र का सीधा संबंध ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और सामरिक संतुलन से जुड़ा है।
यह उल्लेखनीय है कि यह युद्धविराम अभी स्थायी नहीं है, अपितु एक सीमित अवधि के लिए लागू किया नजर आता है, जिससे दोनों पक्ष वार्ता के माध्यम से उचित समाधान खोज सकें। ऐसा बताया जा रहा है कि इस समझौते के अनुसार ईरान ने महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को पुन: खोलने पर सहमति दे दी है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। वरना अन्य महत्वपूर्ण जलमार्ग बाब-अल-मदेब जलडमरूमध्य पर भी घोर संकट के बादल छा रहे थे। यह कदम अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सकारात्मक संकेत भेज सकता हैं और तेल की कीमतों में गिरावट आने की संभावना जताई जा रही है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वैश्विक स्तर पर इस युद्धविराम का सबसे बड़ा प्रभाव आर्थिक क्षेत्र पर पडऩे वाला है। जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि होती हैं, जिसके फलस्वरूप विश्व अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। लेकिन युद्धविराम के बाद तेल की कीमतों में गिरावट के संकेत आने से कई देशों को राहत मिल सकती है। निश्चित रूप से कई देश इस कदम का स्वागत करेंगे और इसे शांति की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास माना जा सकता है। यद्यपि यह भी स्पष्ट है कि युद्धविराम बहुत ही कमजोर धागे के समान है और किसी भी समय टूट सकता है, क्योंकि जहां एक ओर दोनों देशों के बीच मूलभूत मतभेद अब भी दृढ़ बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर इजरायल का अपना दबाव है।
अब यदि भारत के संदर्भ में इस युद्धविराम का विश्लेषण किया जाए, तो इसका प्रभाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी लगभग 40त्न तेल आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से होती है। ऐसे में इस मार्ग का खुला रहना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत ही आवश्यक है। युद्धविराम के कारण तेल की कीमतों में गिरावट आने से भारत को आर्थिक राहत मिल सकती है, तेल विपणन कंपनियों का घाटा कम हो सकता है, जिससे निश्चित रूप से महंगाई नियंत्रित हो सकती है। यह स्थिति भारत के लिए अवसर भी प्रस्तुत करती है कि वह अपनी संतुलित विदेश नीति के माध्यम से वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को और सशक्त करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा संबंधी नीतियों पर पुनर्विचार करे। भारत ने इस पूरी संघर्ष अवधि में परिपक्व संतुलित और तटस्थ नीति अपनाई है। उसने किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन करने की अपेक्षा शांति और संवाद की सार्थक अपील की क्योंकि उसके दोनों ही पक्षों के साथ अच्छे संबंध हैं। वहीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान पूरे घटनाक्रम में किसी चीयर लीडर से अधिक नहीं दिखाई पड़ा है। यद्यपि कुछ चुनौतियां अब भी समक्ष हैं। यदि यह युद्धविराम विफल हो जाता है और संघर्ष पुन: आरंभ होने की दशा में भारत को पुन: ईधन संकट, महंगाई और व्यापारिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
फिर भी अमरीका-ईरान युद्धविराम को वैश्विक शांति की दिशा में चाहे अस्थायी ही सही, पर सकारात्मक कदम कहा जा सकता है। यह विश्व के लिए संदेश है कि युद्ध की अपेक्षा संवाद और कूटनीति ही स्थायी समाधान का मार्ग है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह ऊर्जा नीति को और सुदृढ़ कर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर और अधिक ध्यान दे और वैश्विक मंच पर कूटनीतिक भूमिका को और सशक्त करे। चीन के आत्मनिर्भर ऊर्जा सुरक्षा मॉडल का उचित आकलन कर भारत की स्थानीय परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए अनुसरण किया जा सकता है।
Published on:
09 Apr 2026 04:11 pm
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