
अलवर जिले की बानसूर तहसील के गांव बलबाकाबास में गरीब परिवार में जन्में गोवर्धन की कक्षा छठीं में आखें खराब हो गई। यह पढ़ाई के दौरान मजदूरी करता रहा और दसवीं कक्षा पास करने के बाद इसने नेत्रहीनों के लिए बने स्कूल में प्रवेश लिया और आगे बढ़ता गया।
देवेन्द्र की जब आंखें खराब हुई तो ग्रामीणों ने उनके पिता को उसे मथुरा या गोवर्धन छोड़ आने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जयपुर में नेत्रहीनों के विद्यालय में प्रवेश इसके जीवन का टर्निंग पाइंट बना। नेत्रहीन स्कूल जयपुर में जाने के बाद वहां से कम्प्यूटर व ब्रेल सीखी और 12 वीं पास करने के बाद पंचायत राज में लिपिक के लिए चयन हुआ। इसके मन में अफसर बनने का सपना था। और आगे की पढाई कर कोटपूतली से ग्रेजुएशन किया।
इनका रेलवे में चयन हुआ और इसके बाद शादी हुई। पत्नी अंकिता चौहान ने इनका पूरा साथ दिया। अंकिता चौहान व भाई नरेन्द्र सिंह चौहान से किताबों की रिकार्डिंग करवाई व पढ़ाई में इन दोनों ने पूरा सहयोग किया और आरपीएएससी की परीक्षा दी। बुधवार को आएं आरपीएससी के परिणाम ने देवेन्द्र की दुनिया बदल दी और देवेन्द्र वह बन गया जो उसका सपना था। बुधवार को परिणाम आया तो माता-पिता को पता नहीं, उनका बेटा क्या बन गया। ग्रामीणों ने कहा तुम्हारा बेटा अफसर बन गया तो माता पिता की आंखों में भफ खुशी के आंसू छलक गए।
देवेन्द्र ने पत्रिका को बताया कि सफलता का श्रेय माता-पिता एवं पत्नी सहित गुरुजनों को देते हैं। देवेन्द्र वर्तमान में रतलाम में रेलवे में क्लर्क है। रेलवे की ओर से भी बेस्ट क्लर्क का दो बार अवार्ड भी जीत चुके हैं। देवेन्द्र बताया कि उनका सपना आईएएस बनने का हैं।
Published on:
15 Jul 2021 03:58 pm
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