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एक साल बाद फिर चलने लगी महिला, पहले हड्डी खराब होने से बिगड़ी थी स्थिति, खराब हिप सर्जरी के बाद बिगड़ी थी हालत, अब दोबारा हुआ ऑपरेशन

मरीज पूरी तरह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई और पिछले एक वर्ष से बिस्तर पर थी।

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एआई से बनाई गई तस्वीर

जयपुर। राजधानी में एक जटिल हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी के जरिए 65 वर्षीय महिला को नया जीवन मिला। करीब एक साल पहले महिला का किसी अन्य अस्पताल में हिप रिप्लेसमेंट किया गया था, लेकिन कूल्हे की हड्डी (एसीटैबुलम) की कमजोरी और संरचनात्मक विकृति के कारण ऑपरेशन के कुछ ही समय बाद इंप्लांट फेल हो गया। स्थिति लगातार बिगड़ती गई और कृत्रिम कप अपनी जगह से खिसककर पेल्विस के अंदरूनी हिस्से में धंस गया।

इसके चलते मरीज पूरी तरह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई और पिछले एक वर्ष से बिस्तर पर थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए जयपुर के सीके बिरला अस्पताल में टीम ने विस्तृत जांच के बाद सर्जरी का निर्णय लिया। ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. ललित मोदी ने बताया कि यह सामान्य हिप रिप्लेसमेंट की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण केस था। सबसे बड़ा खतरा इंप्लांट निकालने के दौरान आसपास की प्रमुख रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचने का था, जिससे जान का जोखिम भी हो सकता था।

सर्जरी से पहले सीटी एंजियोग्राफी के जरिए पेल्विस की रक्त वाहिकाओं और हड्डी की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन किया गया। हड्डी में बड़े डिफेक्ट के कारण पारंपरिक इंप्लांट उपयोगी नहीं था, इसलिए मरीज के सीटी स्कैन के आधार पर 3डी प्रिंटिंग तकनीक से विशेष रूप से कस्टमाइज्ड इंप्लांट तैयार किया गया। इसे मरीज की शारीरिक संरचना के अनुरूप डिजाइन और परीक्षण के बाद उपयोग में लिया गया।

करीब 4 से 5 घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी में पहले पुराने इंप्लांट को सावधानीपूर्वक हटाया गया। इसके बाद हड्डी के खाली हिस्से को भरने के लिए एलोग्राफ्ट यानी डोनर बोन का इस्तेमाल किया गया और नए कस्टम इंप्लांट को सटीक तरीके से स्थापित किया गया, ताकि शरीर का वजन संतुलित रूप से वितरित हो सके और भविष्य में इंप्लांट के फेल होने की संभावना कम हो।

सर्जरी में डॉ. हितेश जोशी और सीनियर एनेस्थेटिस्ट डॉ. अतुल पुरोहित भी शामिल रहे। सफल ऑपरेशन और उचित पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ। जो महिला एक साल से बिस्तर पर थी, वह अब दोबारा खड़े होने और चलने में सक्षम हो सकी है। चिकित्सकों के अनुसार मरीज को पांच दिन के भीतर बिना किसी जटिलता के अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।