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हिंसा की गिरफ्त में बचपन: हाथों में किताबें नहीं, जेहन में खंजर; डरा रहे हैं NCRB के आंकड़ें

देश में किशोर अपराधों में पिछले साल के मुकाबले 11.2 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि किशोर अपराध अब केवल चोरी या छोटे-मोटे झगड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहद हिंसक हो चुके हैं।
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जयपुर

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Savita Vyas

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सविता व्यास

Jul 03, 2026

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जयपुर। "सिर धड़ से अलग, दोस्त ही कातिल… क्या स्मार्टफोन की स्क्रीन ने बचपन को 'साइकोपैथ' बना दिया है?" जयपुर में मामूली कहासुनी पर 11 साल के अजमत की बेरहमी से हत्या, या कोटा में पोर्न की लत में अंधे एक 16 साल के किशोर द्वारा अपने ही 10 साल के दोस्त के साथ दरिंदगी। यह कोई स्क्रीन पर चलने वाली थ्रिलर फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज के बीच पनप रहे उस खौफनाक सच की बानगी है, जिसे राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों ने भी पुष्ट किया है। राजस्थान के सामने आई इन घटनाओं ने गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कम उम्र के बच्चों में इतनी क्रूरता क्यों और कैसे पैदा हो रही है?

अपराधों में तब्दील हो रही मासूमियत

एनसीआरबी की 'क्राइम इन इंडिया 2024' रिपोर्ट खुद गवाही दे रही है कि मासूमियत अब हिंसक अपराधों में तब्दील हो रही है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, पेंसिल और सपने होने चाहिए, उसी उम्र में कुछ बच्चे खौफनाक अपराधों की राह पर बढ़ रहे हैं। इन बीच राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 'क्राइम इन इंडिया 2024' रिपोर्ट ने भी देश की चिंता बढ़ा दी है। देश में किशोर अपराधों में पिछले साल के मुकाबले 11.2 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि किशोर अपराध अब केवल चोरी या छोटे-मोटे झगड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहद हिंसक हो चुके हैं।

नैतिकता भूला बचपन, समय रहते संभलने का वक्त

समाजशास्त्री रश्मि ओझा का कहना है कि मोबाइल की स्क्रीन में आज बचपन सिमटकर रह गया है। कभी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां बच्चों को संस्कार, संवेदनशीलता और नैतिकता का पाठ पढ़ाती थीं, लेकिन अब उनकी जगह हिंसक डिजिटल कंटेंट ने ले ली है। इसकी वजह से बच्चों में आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। यदि अब भी परिवारों, स्कूलों और सरकार ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके बदलते व्यवहार को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में यह संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।

आंकड़े दे रहे हैं डरावनी चेतावनी

साल 2024 में किशोरों के खिलाफ 34,878 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2023 में यह संख्या 31,365 थी।
पकड़े गए किशोर: इन मामलों में कुल 42,633 किशोरों को पकड़ा गया, जिनमें से 34,648 मामले आइपीसी और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत दर्ज थे।
उम्र का गणित: पकड़े गए किशोरों में सबसे बड़ी संख्या 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग (77.7%) के बच्चों की है, जिनकी संख्या 33,129 रही।
पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि
रहने की स्थिति: चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पकड़े गए किशोरों में से 36,905 बच्चे अपने माता-पिता के साथ रह रहे थे। वहीं 3,516 अभिभावकों के साथ और 2,216 बेघर थे।
शिक्षा का स्तर: अपराधियों में 2,857 निरक्षर, 8,989 प्राथमिक शिक्षित, 21,068 मैट्रिक तक और 8,301 उच्च माध्यमिक स्तर तक शिक्षित थे।

स्क्रीन पर क्राइम बना रहा आक्रमक

बच्चे सबसे अधिक वही व्यवहार सीखते हैं जिसे वे बार-बार देखते और अनुभव करते हैं। मोबाइल पर लगातार हिंसक डिजिटल कंटेंट देखने से उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना बढ़ जाती है और वे हिंसा के प्रति धीरे-धीरे कम संवेदनशील हो जाते हैं। कई बार स्क्रीन पर क्राइम देखकर उसकी नकल भी करने लगते हैं। इससे बचने के लिए स्क्रीन टाइम के साथ-साथ अभिभावकों की सक्रिय भूमिका भी जरूरी है।

डॉ धर्मदीप सिंह, मनोरोग विशेषज्ञ, एसएमएस अस्पताल

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