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राजस्थान का ऐसा पहला गायों का गांव, जहां बीमार गाय बांसुरी और भजन सुनती हैं…

पड़ोसी जिले जालोर से लगती सीमा पर रेतीले टीलों के बीच करीब 16 साल पहले गायों के लिए बसाया गया नन्दगांव आज हरीतिमा की चादर ओढ़े खूबसूरत गांव बन गया है।

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सिरोही। पड़ोसी जिले जालोर से लगती सीमा पर रेतीले टीलों के बीच करीब 16 साल पहले गायों के लिए बसाया गया नन्दगांव आज हरीतिमा की चादर ओढ़े खूबसूरत गांव बन गया है। 480 हैक्टेयर तक फैले गायों के इस गांव में रेतीले धोरे अब आहिस्ता-आहिस्ता हरियाली में बदलने लगे हैं। यह सब सम्भव हुआ है। एक संत दत्तशरणानन्द के प्रयास से। यहां यह बताना भी जरुरी है कि इस सन्त ने हमेशा अपनी फोटो टीवी या अखबार में छपने से दूरी बनाए रखी। आज भी किसी भी कार्यक्रम के दौरान इनकी फोटो लेने की साफ मनाही है। ऐसे गोऋषि का सपना साकार रुप ले रहा है।

इन दिनों रेवदर क्षेत्र के केसुआ ग्राम पंचायत में आने वाले नन्दगांव को राजस्व गांव बनाने की कवायद चल रही है। यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो आने वाले दिनों में नन्दगांव प्रदेश का पहला ऐसा गायों का गांव बन जाएगा। जहां बीमार गाएं बांसुरी, संकीर्तन और भजन सुनती हैं। इसके लिए यहां गायों के आश्रयस्थल पर जगह-जगह स्पीकर लगे हैं। साल 2005 बसे इस गांव में मौजूदा समय में 10,500 गोवंश पल रहा है। जिले के अंतिम छोर पर आबाद नन्दगांव में बीमार गोवंश को संकीर्तन सुनाने के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि बांसुरी या भजन सुनने से मस्तिष्क में एक नई ऊर्जा मिलती है जिससे बीमार पशुओं में जीने की उम्मीद जगती है और मन प्रसन्न रहता है।

ऐसी यहां कई बीमार गाएं होंगी जो उठ-चल नहीं पाती थीं और अब दौड़ती नजर आती हैं। यह सब सम्भव हुआ है दवाओं के साथ अच्छे वातावरण, संकीर्तन, पौष्टिक आहार और शुद्ध जलवायु से। जैसा कि नन्दगांव में गायों की देखरेख का जिम्मा सम्भाल रहे सन्त सुमन सुलभ कहते हैं कि गायों का जंगल से नाता रहा है। नन्दगांव में खुला वातावरण मिलता है। यहां गायों की चराई के लिए छोटे-छोटे खेत बनाए गए हैं जहां हरे चारे की बुवाई होती है। सब्जियां भी बोई जाती हैं। यहां खुले में गाएं स्वछंद विचरण करी हैं। यहां गर्मी से बचने के लिए गायों के लिए पंखे और कूलर लगे हुए हैं। सर्दी से बचाव के लिए टाटपतरी की व्यवस्था है।

ग्वालों के बच्चों के लिए हिंदी और गुरुकुल विद्यालय भी...
पथमेड़ा गोशाला से जुड़े नंदगांव में गायों की सेवा में लगे ग्वालों के बच्चों के लिए आठवीं तक हिन्दी मीडियम स्कूल भी है। जहां 150 बच्चों पढ़ते हैं। इसके अलावा यहां गुरुकुल विद्यालय में जिसमें 11 बच्चे अध्ययनरत हैं। स्कूल में बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। कोई शुल्क नहीं लिया जाता। छात्रावास की सुविधा भी है। यहां ग्वालों के ठहरने के लिए ग्वाला आवास भी अलग से बने हुए हैं।

इनका कहना है...
हमारा प्रयास है कि नंदगांव को राजस्व गांव का दर्जा मिले। इसके लिए कवायद शुरु की गई है। यदि राजस्व गांव का दर्जा मिलता है तो यह गायों का पहला राजस्व गांव बन जाएगा यहां गोमाता बांसुरी-कीर्तन सुनती हैं।
संत सुमन सुलभ महाराज, प्रभारी, नंदगांव


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