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सावधान! पटाखे दे सकते हैं बीमारी, आतिशबाजी करें, मगर संभलकर, बरतें ये सावधानियां

आतिशबाजी करते समय सावधानी बरतना जरूरी है। कई पटाखों में हानिकारक तत्व, रसायन व गैस निकलते हैं...

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जयपुर। रोशनी का त्योहार दीपावली पटाखों के धमाके और सतरंगी आतिशबाजी के बिना फीका माना जाता है। अधिकांश युवाओं व बच्चों में तो आतिशबाजी का जबरदस्त शौक होता है। यही कारण है कि दीपावली पर आतिशबाजी का कारोबार भी लाखों का होता है, लेकिन अनदेखी और इनमें होने वाला हानिकारक रसायनों का प्रयोग आपकी मस्ती को मुसीबत में बदल सकता है।

पटाखों का असुरक्षित उपयोग से आपको जीवन भर का दर्द भी मिल सकता है। इसलिए आतिशबाजी के दौरान सावधानी बरतना जरूरी है। दीपावली के दौरान अस्पतालों में आंख, त्वचा, कान, मस्तिष्क, ह्वदय एवं श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याओं के मरीजों में यकायक इजाफा हो जाता है। चिकित्सकों के अनुसार सामान्य तौर पर कान 85 डेसीबल तक ही ध्वनि सहन कर सकते है। इससे अधिक आवाज वाले धमाके कान के पर्दे तक फाड़ सकते हैं। इसके अलावा लगातार धमाकों की आवाज से श्रवण शक्ति भी कमजोर हो सकती है। इसलिए आतिशबाजी दूर से करें और छोटे बच्चों का विशेष ध्यान रखें।

छिपे होते हैं हानिकारक रसायन
रॉकेट---- आसमान में जाकर फूटने वाले पटाखे जैसे रॉकेट, स्काय शॉट आदि में चारकोल, पोटेशियम नाइटे्रट के अलावा सल्फर व एल्यूमिनियम के मिश्रण से तैयार किए जाते है।

बम--- तेज आवाज वाले बम बनाने में बेहद विषैले तत्वों का प्रयोग किया जाता है। इनमें भी चारकोल, पोटेशियम नाइट्रेट, सल्फर आदि शामिल होते है।

फुलझड़ी---चकाचौंथ करने वाली व रंगीन रोशनी छोडऩे वाले पटाखे जैसे अनार, फुलझड़ी व चकरी आदि बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमिनियम, सल्फर व चारकोल से तैयार किए जाते है।

पटाखा चलाते समय यह बरतें सावधानी
-पटाखे खुले मैदान में ही चलाएं
-पटाखे चलाते समय सूती व चुस्त कपड़े पहने
-बड़ों की देखरेख में ही बच्चों को पटाखे चलाने दें
-पटाखे छोडऩे वाले स्थान पर मिट्टी व पानी की भरी बाल्टी रखें
-बहती हवा के विपरीत दिशा मेें पटाखे चलाएं, इससे धुआं से बचा जा सकता है।
-प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स में डिटॉल, बरनॉल, गॉज पट्टी, रूई, कैंची, पेन किलर टेबलेट आदि जरूर रखें।


आतिशबाजी करते समय सावधानी बरतना जरूरी है। कई पटाखों में हानिकारक तत्व, रसायन व गैस निकलते हैं, जो स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव डालने के साथ ही वातावरण को भी प्रदूषित करते हैं। इनसे आंख, त्वचा, कान, मस्तिष्क, श्वसन एवं एलर्जिक रोग हो सकते है।

----डॉ. एएल अग्रवाल, प्रभारी, सीएचसी, शाहपुरा।