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पर्यावरण संरक्षण: राजस्थान में लगाए लाखों पौधे, अन्य राज्यों में भी लगाए जा रहे, हरियाली बढ़ाने के साथ स्थानीय प्रजातियों पर दिया जा रहा जोर

पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने को लेकर देशभर में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों में पौधरोपण अभियानों के जरिए सूखे और बंजर इलाकों में फिर से हरियाली लौटाने की कोशिश हो रही है। अभियान के तहत राजस्थान में लाखों पौधे लगाए गए है। वहीं पिछले कई वर्षों से राजस्थान सहित अन्य राज्यों में जमीन स्तर पर काम करते हुए करीब 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण किया गया है और ढाई करोड़ से ज्यादा पौधें लगाए गए है।

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Environmental Conservation

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जयपुर। पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने को लेकर देशभर में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों में पौधरोपण अभियानों के जरिए सूखे और बंजर इलाकों में फिर से हरियाली लौटाने की कोशिश हो रही है। अभियान के तहत राजस्थान में लाखों पौधे लगाए गए है। वहीं पिछले कई वर्षों से राजस्थान सहित अन्य राज्यों में जमीन स्तर पर काम करते हुए करीब 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण किया गया है और ढाई करोड़ से ज्यादा पौधें लगाए गए है। स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी से संभव है। राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में यह अभियान चलाया जा रहा है।

स्थानीय प्रजातियों पर फोकस

राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, बड़गांव और जोधपुर क्षेत्रों में करीब साढ़े सात लाख पौधे लगाए गए। पौधरोपण के दौरान स्थानीय जलवायु और जमीन के अनुसार पौधों का चयन किया गया। राजस्थान और गुजरात में अरावली क्षेत्र की कठोर प्रजातियों जैसे लसोड़ा, चामरोड़, बहेड़ा, निर्गुंडी, वज्रदंती, मेहंदी और करौंदा को प्राथमिकता दी गई। वहीं मराठवाड़ा क्षेत्र में लोगों की पसंद को देखते हुए नीम के पौधे लगाए गए।

पेड़ केवल हरियाली नहीं, जरूरत भी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ सिर्फ छांव देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में भी उपयोगी साबित होते हैं। सड़क किनारे लगे छायादार पेड़ों के नीचे छोटे दुकानदारों और रेहड़ी संचालकों को राहत मिलती है। इससे गर्मी में काम करना आसान होता है और कई बार अतिरिक्त खर्च भी बच जाता है।

आयुर्वेद में भी है महत्व

पीपल सहित कई पेड़-पौधों का आयुर्वेद में विशेष महत्व माना जाता है। पीपल के पत्तों का उपयोग अस्थमा जैसी बीमारियों में किया जाता है, जबकि इसका काढ़ा हृदय रोगों में उपयोगी माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार स्थानीय और पारंपरिक प्रजातियां पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होती हैं।

कोरोना काल में भी जारी रही देखभाल

पौधरोपण अभियान से जुड़े लोगों ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान भी पौधों की देखभाल का काम नहीं रुका। लॉकडाउन के समय पौधों को पानी देने और उनकी सुरक्षा का काम करते रहे। लोगों का कहना है कि पौधे लगाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनकी नियमित देखभाल करना भी है। अभियान का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और प्रकृति से जुड़ाव बढ़ाना बताया गया है।