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ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले में राज्यों को भी दिया जाएगा बहस का मौका

सुप्रीम कोर्ट : केस को पांच दिन में निपटाने की कोशिश

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जयपुर

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Aryan Sharma

Sep 07, 2022

ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले में राज्यों को भी दिया जाएगा बहस का मौका

ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले में राज्यों को भी दिया जाएगा बहस का मौका

नई दिल्ली. देश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण मिलेगा या नहीं, इस मुद्दे पर फैसला जल्द आने के आसार हैं। ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले पर सीजेआइ यू.यू. ललित की अगुवाई वाली संविधान पीठ 13 सितंबर से सुनवाई करेगी। हालांकि कोर्ट ने राज्यों को नोटिस जारी करने से इनकार किया है, लेकिन कहा कि राज्यों को केस में बहस करने का मौका दिया जाएगा। अगर संविधान पीठ ईडब्ल्यूएस कोटा को वैध करार देती है तो सरकारी नौकरियों और कॉलेज एडमिशन में लाखों युवाओं को फायदा मिलेगा।
कोर्ट ने सभी पक्षकारों को मुद्दों का ड्राफ्ट देते हुए कहा कि गुरुवार तक सभी अपना पक्ष तैयार कर लें। कोर्ट आठ सितंबर को तय करेगा कि मामले की सुनवाई किस तरीके से और कितने समय में की जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह सुनवाई पांच दिन में खत्म करने की कोशिश करेगी। दोनों पक्षों के वकीलों का कहना है कि उन्हें मामले में बहस के लिए 20 घंटे की जरूरत है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने जिरह के लिए 17 घंटे, जबकि अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने तीन घंटे मांगे हैं।

यह है मामला
जनवरी 2019 में संसद में संशोधन के जरिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में खंड (6) शामिल कर नौकरियों और शिक्षा में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रस्ताव किया गया था। आरक्षण की ऊपरी सीमा 10 फीसदी रखी गई थी, जो पहले से जारी आरक्षण के अतिरिक्त है। संशोधन को अधिसूचित किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में ईडब्ल्यूएस आरक्षण की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का एक बैच दायर किया गया था।

हाई कोर्ट के आदेश को भी दी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली आंध्र सरकार की याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगा। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मुसलमानों को आरक्षण देने वाले एक स्थानीय कानून को खारिज कर दिया था। पांच न्यायाधीशों की पीठ ने चार भिन्न मतों वाले फैसले में स्टेट टू मुस्लिम कम्युनिटी एक्ट 2005 के तहत इन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया था।

सीमा तय करने के बाद इजाजत
सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में आदेश दिया था कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन 2010 में उसने राज्यों को आरक्षण सीमा 50 फीसदी से बढ़ाने की इजाजत दे दी थी।