अर्जुन जैसे महान योद्धाओं को विपत्ति के समय शरण देने का गौरव और माण्डव ऋषि की तपोस्थली होने का सौभाग्य हासिल है। महाभारत काल में मेरे विशाल एवं ऊंचे ताल वृक्षों में पाण्डवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाए थे और एक साल का अज्ञात वास विराट नगर के राजा की चाकरी करते हुए बिताया था।
आपको शायद भान नहीं होगा कि मेरे विशालकाय पेड़ों की छाया में ही माण्डव ऋषि ने अपने जीवन काल का अंतिम समय घोर तपस्या कर बिताया, जिससे यह क्षेत्र धन्य हो गया और तालवृक्ष के नाम से ख्यात हो गया। मेरे पर्वत अरावली अंचल के होते हुए भी नेत नाग नाम से अलग पहचान रखते हैं। विदुर को भी माण्डव ऋषि के श्राप के कारण मेरे क्षेत्र में घूमना पड़ा।
मुझे जहां गंगा मां और वराह भगवान के मंदिर का आशीर्वाद प्राप्त है, वहीं गर्म और पानी के कुण्ड तथा राजपूतकालीन छतरियां भी मेरे वैभव की शोभा बढ़ाती प्रतीत होती है। बस मलाल है तो बस ये कि आधुनिक प्रशासकों की अनदेखी मेरे वैभव और सुरम्यता पर ग्रहण लगा रही है।
हालांकि वन क्षेत्र की कटाई पर प्रतिबंध की वजह से अब सांभर जैसे वन्य जीव जरुर विचरण करने लगे हैं, लेकिन जब तक इसे सफारी क्षेत्र का दर्जा देकर पर्यटकों के घूमने के लिए रास्ते नहीं बनाए जाएंगे, हालत में सुधार नहीं होगा।
खेत से निकली थी वराह भगवान की प्रतिमातालवृक्ष में ही वराह भगवान की अष्ट धातु की मूर्ति स्थापित थी। यहां से चोर बेशकीमती मूर्ति को चुरा ले गए और विदेश बेचने के लिए ले जा रहे थे। जांच के दौरान ये चोर कलकत्ता के दमदम हवाई अड्डे पर पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
तत्कालीन तहसीलदार श्यामसिंह व जिला कलक्टर के सहयोग से इस मूर्ति को बरामद कर अलवर अजायबघर संग्रहालय के मालखाने में रखवा दिया है। यह मूर्ति संवत 2020 में एक खेत में हल की नोक में अटक कर बाहर निकली थी।
कला का नमूना है यहां की छतरियां
तालवृक्ष में राजपूत कालीन व बागड़ा समाज की मुगल कालीन छतरियां स्थित हैं। इन छतरियों में मुगल शैली में चित्रकला की गई है। हालांकि, दुकानदार अतिक्रमण करउनका अस्तित्व बदलने को लगे है। पर्यटन विभाग की अनदेखी के कारण यह छतरियां जर्जर हालत में पहुंच चुकी है और अपने अस्तित्व को खोती जा रही हैं।
शिवभक्तों को लुभाता है सात फीट का शिवलिंगतालवृक्ष की एक विशेषता और है, जो कि यहां स्थापित शिवलिंग के कारण है। यहां पांडव अर्जंुन के आराध्य देव भगवान शिव शंकर का सात फीट ऊंचा शिवलिंग है। ये शिवलिंग यहां पहुंचने वाले शिवभक्तों को अनायास ही आकर्षित करता है। ग्रामीणों ने बताया कि इस स्थल को भूतेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

गर्म व ठण्डे पानी के कुण्डतालवृक्ष में मुख्य आकर्षण का केन्द्र गर्म व ठण्डे पानी के कुण्ड है। पहले ये कुण्ड कच्चे थे। हालांकि, अब ये पक्के बनवा दिए गए हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने से चर्म रोग दूर होता है। ऐसे में यहां काफी संख्या में क्षेत्र ही नहीं, दूरदराज से भी लोग पहुंचते हैं।
आस्था का केन्द्र है गंगा मैया का मंदिरयहां गंगा मां का मंदिर अनूठा है। आमेर नरेश रामसिंह के शासनकाल में बाबा पूर्णदास ने मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कराई थी। तालवृक्ष में भक्त गंगा मां की पूजा अर्चना कर लाभ उठाते हैं। साल में दो बार कार्तिक पूर्णिमा को तथा बैसाख पूर्णिमा को यहां गंगा स्नान होता है।
किवदंती के अनुसार माण्डव ऋषी की आत्मा रोज गंगा स्नान करने जाया करती थी। गंगा उनकी तपस्या से खुश होकर स्वयं यहां दो धारा लेकर प्रकट हुई थी। जिसमें एक में गर्म पानी व दूसरे में ठण्डे पानी की धार है।