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पत्रिका एक्सपोज: 1865 करोड़ का बिजली प्लांट, 900 करोड़ में बेचने की तैयारी

जनता पर फ्यूल सरचार्ज का बोझ और करोड़ों के घाटे के बाद सरकार ने गिरल लिग्नाइट थर्मल पावर प्लांट बेचने की तैयारी कर ली है। बाड़मेर में 1865 करोड़ रुपए लागत से बना प्लांट जल्द निजी हाथ में जाएगा।

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पत्रिका एक्सपोज: 1865 करोड़ का बिजली प्लांट, 900 करोड़ में बेचने की तैयारी

भवनेश गुप्ता/जयपुर। जनता पर फ्यूल सरचार्ज का बोझ और करोड़ों के घाटे के बाद सरकार ने गिरल लिग्नाइट थर्मल पावर प्लांट बेचने की तैयारी कर ली है। बाड़मेर में 1865 करोड़ रुपए लागत से बना प्लांट जल्द निजी हाथ में जाएगा। इसके लिए निगम और विनिवेश के लिए जुड़ी सलाहकार कंपनी एसबीआइ कैपिटल मार्केट लिमिटेड ने शेयर ट्रांसफर एग्रीमेंट तैयार कर लिया। वित्त विभाग ने इसे मंजूरी दे दी और अंतिम मुहर के लिए मुख्यमंत्री (बतौर वित्त मंत्री) के पास भेजा गया है। इसके लिए न्यूनतम दर 900 करोड़ रुपए तय की गई है। इसमें 250 मेगावॉट क्षमता की दो यूनिट हैं। पांच कंपनियों ने प्लांट को खरीदने की इच्छा जताई है।

गंभीर यह है कि उत्पादन निगम ने प्लांट को फिर से खुद चलाने की मंजूरी मांगी पर सरकार ने नहीं दी और निजी कंपनी को सौंपने के निर्देश दे दिए। प्लांट 2016 के बाद से बंद है। अब तक 1300 करोड़ से ज्यादा का घाटा हुआ है। फ्यूल सरचार्ज के नाम पर जनता की जेब से करोड़ों वसूल लिए। इसके बावजूद किसी की सीधी जिम्मेदारी तय नहीं की गई।

प्लांट बंद होने से अब तक घाटा
वर्ष 2014-15 में प्लांट में कुल घाटा 786करोड़ 71 लाख था, जो 2015-16 में बढ़कर 958 करोड़ 91 लाख रुपए हो गया। वर्ष 2018-19 में 400 करोड़ रुपए बताया गया है।


जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं..
उत्पादन निगम ने प्लांट निर्माण के लिए लोन लिया। इसमें 1500 करोड़ रुपए चुकाए जा चुके हैं और 300 करोड़ रुपए अब भी चुकाने हैं। इसके अलावा 370 करोड़ रुपए राज्य सरकार का हिस्सा है। विद्युत विनियामक आयोग में बिजली दर बढ़ोतरी की पीटिशन दायर होती है, तब लोन राशि को भी अंकित करते हैं। हालांकि, निगम प्रशासन ने इस घाटे का सीधा जनता पर बोझ से इनकार किया है।

लापरवाही से मेहरबानी तक

1. पहले समस्या बढ़ाई
प्लांट संचालन के लिए गिरल माइन्स से ईंधन लेना तय किया गया, लेकिन यहां लिग्नाइट में सल्फर की मात्रा 5 से 7 प्रतिशत थी। इस कारण प्लांट को बार—बार बंद करने की नौबत आई। सल्फर की मात्रा को कम करने के लिए ईंधन में अन्य रसायन मिलाए गए, लेकिन इससे भी समस्या बनी रही। इसके बाद भी दूसरी यूनिट शुरु की गई। तकनीकी टीम ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। 2009 से 2016 के बीच 15 से 30 प्रतिशत तक ही बिजली उत्पादन हुआ।

2. फिर सुझाया समाधान
उत्पादन निगम ने गिरल माइन्स की जगह कपरड़ी या जालिपाकपोड़ी माइन्स से लिग्नाइट लेने और प्लांट को दोबारा शुरु करने के लिए 170 करोड़ लागत का प्रस्ताव सौंपा। सरकार ने इसे नकार दिया।

3. अब निजी पर मेहरबान
निजी कंपनी को भी इसके संचालक के लिए ईंधन दूसरी जगह से लेना होगा। उसके पास भी कपूरड़ी या जालिपाकपोड़ी माइन्स मुख्य विकल्प हैं, जहां 170 मिलियन टन की क्षमता बाकी है। इसकी विकल्प को उत्पादन निगम ने भी उपयोग के लिए मांगा था। इस माइन्स के लिग्नाइट में अधिकतम एक प्रतिशत सल्फर है।

प्लांट क्षमता
125-125 मेगावॉट के 2 प्लांट
प्रोजेक्ट लागत : यूनिट एक-764 करोड़ और यूनिट दो- 750 करोड़
जमीन: 661.25 बीघा
विद्युत उत्पादन हुआ : 3211.27 मिलियन यूनिट (2009 से
2016 के बीच)


दो साल तक नहीं बेचने की बंदिश
बिक्री-खरीद समझौता दस्तावेज तैयार किया गया है। जो भी कंपनी अधिकतम बोली पर प्लांट खरीदेगी, वह प्लांट को दो साल तक बेच नहीं सकेगी। उसे प्लांट का संचालन करना होगा।

बिजली जयपुर, जोधपुर और अजमेर डिस्कॉम्स को ही देनी होगी।

बिजली खरीद की टैरिफ विद्युत विनियामक आयोग तय करेगा।

प्लांट में कार्यरत कर्मचारियों को नौकरी देने से लेकर अन्य शर्तें भी हैं।

प्लांट के विनिवेश का फैसला पहले हो चुका है। शेयर ट्रांसफर एग्रीमेंट वित्त विभाग को अनुमोदन के लिए भेजा गया है। इसके बाद ही आगे कार्रवाई शुरू करेंगे। बिड प्रक्रिया गोपनीय रहती है, इसमें शामिल कंपनियों की जानकारी और प्लांट खरीद की दर पता नहीं की जा सकती है।
-अजिताभ शर्मा, ऊर्जा सचिव