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30 किलो वजनी पोशाक पर शुद्ध सोने-चांदी के करोड़ों के गहने पहनकर निकलेंगे राधा-गोपालजी, अद्धभूत होता है नजारा

जयपुर की पारंपरिक गोपालजी की हेड़े की परिक्रमा का वैभव साल दर साल बढता जा रहा है। आज से 199 साल पहले शुरू हुई परिक्रमा में स्वरूपों को धारण कराए जाने वाले आभूषणों में कई गुणा वृद्धि हुई है। इस बार परंपरागत तरीके से निकलने वाली गोपालजी के हेड़े की परिक्रमा में राधा गोपालजी, ललिता—विशाखा सखियों के स्वरूप सोने-चांदी की बनी सुनहरी जरी की पोशाक पर करोड़ों रुपए मूल्य के जेवर धारण कर नगर भ्रमण पर निकलेंगे।

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vidhani

देवेन्द्रसिंह

जयपुर। देश दुनिया भले ही मंदी के दौर से गुजर रही रही हो, लेकिन जयपुर की पारंपरिक गोपालजी की हेड़े की परिक्रमा का वैभव साल दर साल बढता जा रहा है। आज से 199 साल पहले शुरू हुई परिक्रमा में स्वरूपों को धारण कराए जाने वाले आभूषणों में कई गुणा वृद्धि हुई है। इस बार परंपरागत तरीके से निकलने वाली गोपालजी के हेड़े की परिक्रमा में राधा गोपालजी, ललिता-विशाखा सखियों के स्वरूप सोने-चांदी की बनी सुनहरी जरी की पोशाक पर करोड़ों रुपए मूल्य के जेवर धारण कर नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इसके चलते पांच थानों की पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच स्वरूपों की शोभायात्रा निकाली जाती है।

इसलिए खास है हेड़े की परिक्रमा
वैसे तो छोटी काशी में अनेकों परिक्रमाएं निकलती है, लेकिन गोपालजी की हेड़े की परिक्रमा जयपुर की बात ही कुछ अलग है। राजेन्द्र कुमार झरोखेवाले के मुताबिक परिक्रमा में राधा गोपालजी व ललिता व विशाखा सखी के स्वरूप 171 साल पुरानी सोने-चांदी की सुनहरी जरी की बनी पोशाक धारण कर नगर भ्रमण पर निकलते है। करीब 171 साल पहले समाज के लोगों ने शुद्ध सोने-चांदी की जरी से 30 किलो वजनी चार पोशाक तैयार करवाई थी। इसमें प्रत्येक पोशाक का वजन 8 किलो है।

महाराजा जयसिंह करते थे दर्शन
हेड़े की परिक्रमा को अग्रवाल समाज के लोगों ने संवत 1876 में समाज के लोगों को जोड़ने के लिए समाज गोपालजी का मंदिर बना कर गोपालजी की नगर परिक्रमा निकालना शुरू किया था। उस समय इस परिक्रमा के प्रति समाज के साथ राज परिवार की भी पूरी श्रद्धा थी महाराजा जयसिंह द्वितीय स्वयं त्रिपोलिया गेट पर स्वरूपों के दर्शनों के लिए आते थे और सोने की एक गिन्नी भेंट करते थे।

खास है अग्रवाल समाज की मोतिया पगड़ी
हेड़े की परिक्रमा में 5 साल के बच्चे से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग शामिल होते हैं। परिक्रमा में सभी सफेद धोती-कुर्ता और मोतियां रंग की पगड़ी पहन कर नंगे पांव चलते है। छह कोस परिक्रमा में ढोलक व मजीरों के साथ भक्त मंडली के सदस्य भजन कीर्तन करते हुए चलते हैं। परिक्रमा से पहले चांदी की ढोलकी की पूजा होती है और समाज मुखिया के ढोलकी बांधी जाती है। तीन पीढ़ियों से धोतीवाला परिवार ढोलकी बांध रहा है। वर्तमान में कई सालों कुंजबिहारी धोतीवाला के इलकी बांधी जाती है।

-हेड़े की परिक्रमा जयपुर की विरासत है। अग्रवाल समाज के लोगों को आपस में जोड़ने के लिए हेड़े की परिक्रमा शुरू की थी। इस विरासत को बचाने के लिए युवा पीढ़ी में जुड़ाव पैदा किया जा रहा है।

कुंजबिहारी धोतीवाला, महामंत्री भक्त मंडली