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बलात्कार पीड़िताओं के गर्भपात में देरी, हाईकोर्ट गंभीर, 4 महिला अधिवक्ताओं को नियुक्त किया न्यायमित्र

बलात्कार पीड़िताओं के गर्भपात में देरी के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीरता दिखाई है, इस संबंध में गाइडलाइन तय करने का संकेत दिया है। कोर्ट ने स्वप्रेरणा से जनहित याचिका दर्ज की थी।

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Rajasthan High Court

Rajasthan News: जानकारी के अभाव में बलात्कार पीड़िताओं के गर्भपात में देरी और कई बार प्रसव के समय पीड़िता किशोरियों की जान खतरे में पड़ने की स्थिति को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीरता दिखाई है। कोर्ट ने बलात्कार के मामलों में गर्भपात के लिए गाइडलाइन तय करने का संकेत दिया, वहीं केंद्र और राजस्थान सरकार से 4 सप्ताह में जवाब देने को कहा है।

कोर्ट ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (रालसा) को पक्षकार बनाया, वहीं अदालती कार्यवाही में सहयोग के लिए चार महिला अधिवक्ताओं को न्यायमित्र नियुक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव व न्यायाधीश उमाशंकर व्यास की खंडपीठ ने स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर यह आदेश दिया।

इन्हें किया नियुक्त

कोर्ट ने अधिवक्ता सुशीला कलवानिया, पल्लवी मेहता, प्रियांशा गुप्ता व सोनल गुप्ता को न्यायमित्र नियु€क्त किया। इन चारों अधिवक्ताओं को सुनवाई के दौरान न्यायालय का सहयोग करने को कहा गया है।

खतरे में पड़ती है जान

पुलिस सहित अन्य संबंधित एजेंसियां बलात्कार पीड़िता को गर्भपात संबंधी प्रावधानों की समय पर जानकारी नहीं देती हैं। जिससे कई बार प्रसव के समय नाबालिग पीड़िताओं की जान खतरे में पड़ जाती है।

कोर्ट पहुंचा यह मामला

बिहार की नाबालिग को तस्करी कर कोटा लाया गया। पुलिस ने उसे मुक्त कराया। वह गर्भवती थी। बाल कल्याण समिति ने उसे बालिका गृह भेज दिया। गर्भपात की अनुमति के लिए मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जिस पर कोर्ट ने यह याचिका दर्ज की।

कानूनी प्रावधान : दी मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ए€ट 1971 के अनुसार 24 हफ्ते से अधिक अवधि के भ्रूण के मामलों में गर्भपात के लिए अदालत से अनुमति आवश्यक है।
समस्या: जब तक ऐसे मामले अदालत पहुंचते हैं अधिकतर में चिकित्सकीय आधार पर गर्भपात की अनुमति दिया जाना संभव नहीं होता।

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