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मानसून आते ही टापू बन जाता है जयपुर, ड्रेनेज प्लान के लिए 4000 करोड़ की जरूरत; जानें चंडीगढ़-इंदौर से पीछे क्यों

Jaipur Drainage Master Plan: ऐतिहासिक और आधुनिकता का बेजोड़ संगम कहा जाने वाला जयपुर शहर मानसून में टापू में तब्दील हो जाता है। परकोटा से लेकर बाहर के इलाके में एक जैसा हाल होता है।

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Jaipur Rain

जयपुर में बारिश। फाइल फोटो एएनआई

जयपुर। ऐतिहासिक और आधुनिकता का बेजोड़ संगम कहा जाने वाला जयपुर शहर मानसून में टापू में तब्दील हो जाता है। परकोटा से लेकर बाहर के इलाके में एक जैसा हाल होता है। नाला सफाई कर सब कुछ सही करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि चंद घंटों की बारिश शहर की रफ्तार पर ब्रेक लगा देती है। कारण साफ है…पानी के प्राकृतिक रास्तों को रोक दिया गया। पहाड़ों से आने वाले पानी के जो पारंपरिक बहाव क्षेत्र (नेचुरल ड्रेनेज रूट्स) थे, वहां आज कॉलोनियां विकसित हो गईं।

सड़कें बिछाने से पानी का रास्ता बिगाड़ दिया। जब पानी को बहने का रास्ता नहीं मिला, तो उसने शहर की सड़कों को ही अपना रास्ता बना लिया। जयपुर के ड्रेनेज सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता इसका टुकड़ों में बनना है। मास्टर ड्रेनेज प्लान सालों से फाइलों में दबा है। जब भी कोई नया इलाका बसता है, वहां ड्रेनेज सिस्टम को भविष्य की आबादी और वाटर-फ्लो के हिसाब से डिजाइन करने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी ध्यान ही नहीं देते।
बजट का रोड़ा

ड्रेनेज प्लान के लिए 4000 करोड़ रुपए की जरूरत

जयपुर शहर में ड्रेनेज प्लान के लिए 4000 करोड़ रुपए की जरूरत है। जेडीए ड्रेनेज विकसित करने पर 50 से 60 करोड़ रुपए सालाना खर्च करता है। नगर निगम और जेडीए के पास बड़े ड्रेनेज प्रोजेक्ट्स के लिए हमेशा बजट का अभाव रहता है। नतीजतन, ड्रेनेज सिस्टम का काम किस्तों में होता है, जो मानसून आते ही पूरी तरह फेल हो जाता है। अभी अजमेर रोड, खातीपुरा, विद्याधर नगर, सांगानेर क्षेत्र में ड्रेनेज लाइन का काम चल रहा है।

प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण

आमागढ़, नाहरगढ़ और झालाना की पहाडिय़ों से उतरने वाले पानी के मुख्य रास्तों (कैचमेंट एरिया) पर धड़ल्ले से निर्माण हो चुके हैं। द्रव्यवती नदी के स्वरूप से छेड़छाड़ और अन्य सहायक नालों पर हुए कब्जों ने शहर का दम घोंट दिया है। दिल्ली रोड स्थित लाल डूंगरी में बहाव क्षेत्र में कॉलोनियों के बनने से बारिश में बुरा हाल हो जाता है। मुरलीपुरा में चरण नदी का बहाव ही खत्म हो गया। अम्बाबाड़ी से गुजरने वाली द्रव्यवती नदी में मिट्टी भरी जा रही है। लिंक रोड पर अभी से पानी भर गया है।

इन शहरों में है व्यवस्था बेहतर

चंडीगढ़: यह देश का सबसे बेहतरीन प्लान्ड सिटी है। यहां प्राकृतिक ढलान को समझे बिना एक भी निर्माण नहीं किया गया। मानसून के पानी के लिए स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज नेटवर्क बिल्कुल अलग और मजबूत किया है।
इंदौर: स्वच्छता में नंबर वन इंदौर में नदियों और नालों को न केवल अतिक्रमण मुक्त किया, बल्कि वाटर प्लस सिटी बनाने के लिए सीवरेज और रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य रूप से लागू किया।
नवी मुंबई: इस शहर को होल्डिंग पॉन्ड्स तकनीक पर बसाया गया है। भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी इन तालाबों में जमा हो जाता है और हाई टाइड या बाढ़ जैसी स्थिति से शहर बच जाता है।

पानी निकासी का वैज्ञानिक प्लान बने

पिछले कुछ दो दशक में तेजी से शहरी विस्तार हुआ, लेकिन उसके अनुरूप स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज नेटवर्क विकसित नहीं हो सका। नई कॉलोनियों में सड़कें और सीवर लाइनें तो बनीं, लेकिन बारिश के पानी की निकासी का वैज्ञानिक प्लान तैयार नहीं हुआ। सबसे पहले पूरे शहर का एक डिजिटल रेन वाटर रूट मैप तैयार किया जाए, जिससे यह पता चले कि किस इलाके का पानी किस ढलान से होकर गुजरता है। जब तक पानी के नेचुरल फ्लो को री-स्टोर नहीं किया जाएगा और नए ड्रेनेज प्रोजेक्ट्स को एकमुश्त बजट देकर समय पर पूरा नहीं किया जाएगा, तब तक जयपुर को हर मानसून में डूबने से कोई नहीं बचा सकता।
-चंद्रशेखर पाराशर, सेवानिवृत्त अतिरिक्त नगर नियोजक