
जितेन्द्र सिंह शेखावत
राजधानी के घाटगेट दरवाजे का मूल नाम रामपोल है। तत्कालीन राजाओं ने जयपुर को अयोध्या मानकर इस द्वार को राम के भाई भरत के नंदी ग्राम का स्वरूप माना था। लंका विजय कर वापस अयोध्या लौटे भगवान राम का छोटे भाई भरत से नंदी ग्राम के प्रतीक इस दरवाजे पर मिलाप होता था। तब घाटगेट बाहर सजे-धजे हाथियों पर सवार हो भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के पात्र एक हवेली में जाकर भरत जी से मिलते थे। फिर रामचन्द्र जी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व सीताजी के साथ अयोध्या रूपी जयपुर नगर में प्रवेश करते थे।
जयपुर फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे सियाशरण लश्करी के मुताबिक दरवाजे के बाहर एक हवेली को इस आयोजन के लिए तीन दिन के लिए खाली कराया जाता था। घाट दरवाजे से सिंहद्वार तक कभी चांदपोल से आने वाली द्रव्यवती नदी के स्वच्छ जल की नहर भी बहती रही, जो कि बाद में गंदा नाला बन गई। इस नाले को संजय बाजार से इंद्रा बाजार की गंदी मोरी तक पाट कर ही बाजार बने हैं।
सन् 1931 की जन गणना में घाटगेट चौकड़ी की आबादी 43,952 थी। तोपखाना हजूरी में 27,348 लोग निवास करते थे। घाटगेट इलाके में हिंदू और मुसलमान योद्धाओं को बसाया गया। घाटगेट में तत्कालीन रियासत की सैनिक छावनी थी। यहां पर कई तोपें रखी गई थीं। अब इस जगह आरएसी का मुख्यालय है। अफगानिस्तान से आए तोप बनाने और चलाने में माहिर योद्धा छावनी में तैनात रहते थे। इस वजह से इसका नाम चौकड़ी तोपखाना हजूरी और रास्ते का नाम तोपखाने का रास्ता पड़ा। सिपाहियान, महावतान व छप्पर बंधान आदि मोहल्ले यहां है। यहां के एक महावत को रियासत में मंत्री भी बनाया गया था।
फौजदार और सिपाहियों की वीरता के किस्से आज भी सुनने को मिलते हैं। पोलो की स्टिक, तीर और तलवार आदि हथियार बनाने वाले लोहारों का मोहल्ला और उनकी मस्जिद भी है। गीजगढ़ ठाकुर के रास्ते को महावतों का रास्ता भी कहते हैं। दिवंगत तकीऊद्दीन और निमोडिया हाऊस के सईद गुडएज कांग्रेस के नेता थे। आगरा से आए घरों के छप्पर बांधने वालों के रास्ते में पहले पागलखाना था। इसे सन् 1934 में चांदपोल के बाहर स्थानांतरित कर दिया। दरवाजे की सुरक्षा का जिम्मा मीणा सैनिकों के पास रहा। सन् 1937 में यहां के लालचंद मीणा ने आगरा से बीए किया था। पन्ना लाल मीणा सवाई रामसिंह के राज में खबर नवीस थे।
Published on:
29 Nov 2022 03:31 pm
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