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Jaipur Holi : जयपुर में होली पर होती थी गालीबाजी, अब फागोत्सव में बदली यह अनोखी परंपरा

Jaipur Holi : राजस्थान के जयपुर में फाल्गुन की मस्ती और होली के गीत का लंबा इतिहास रहा है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि चौड़ा रास्ता के ताड़केश्वर मंदिर के बाहर व पुरानी बस्ती में गालीबाजी का आयोजन होता था।

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Jaipur Holi used to have abusive language but this Unique tradition has now changed during festival of colours

जयपुर के अजमेरी गेट के पीपलेश्वर महादेव मंदिर में फाग महोत्सव में नाचते-गाते लोग। फोटो पत्रिका

Jaipur Holi : राजस्थान के जयपुर में फाल्गुन की मस्ती और होली के गीत का लंबा इतिहास रहा है। कभी परकोटे में गली-गली व मोहल्लों में रातभर लोग जुटते और ढाप-चंग पर होली के गीत गाते। महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते। चौड़ा रास्ता के ताड़केश्वर मंदिर के बाहर व पुरानी बस्ती में कई जगहों पर गालीबाजी का आयोजन होता था। गालीबाजी के माहौल के बीच हंसी ठिठोली होती थी।

इतिहासकार सियाशरण लश्करी बताते हैं कि गालीबाजी में लोग समसामयिक विषयों पर पंक्तियां तैयार कर कटाक्ष करते हुए सुनाते, दूसरा पक्ष भी मौके पर ही पंक्तियां बनाकर जवाब देता, हारने वाले पक्ष की ओर से ठंडाई पिलाई जाती व मिठाई खिलाई जाती। अब फाग की यह परंपरा फागोत्सव में बदल गई।

जयपुर में होली के हैं कई रंग

जयपुर की होली को लेकर और कई कहानियां प्रचलित हैं। होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि परंपराओं, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा उत्सव है। जयपुर में होली का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। सवाई जयसिंह के समय से चली आ रही परंपरा का उल्लास सवाई मानसिंह द्वितीय के दौर में परवान पर चढ़ गया।

इतिहासकारों के अनुसार, सवाई मानसिंह द्वितीय अपने शासनकाल में हाथी पर बैठकर बाजार में निकलते थे। पीछे सेवक ऊंटगाड़ी में रंग से भरी टंकियां लेकर चलते। सेवक पिचकारी भरकर उनके हाथों में देते और वे जनता पर रंग बरसाते।

बदलती परंपरा

सबसे पहले सिटी पैलेस में होली मंगलाते थे। वहां से लोग अग्नि लेकर विभिन्न जगहों पर जाते और होली मंगलाते। अब यह परंपरा परकोटे में कुछ जगहों तक सीमित हो गई है, जबकि अधिकतर स्थानों पर लोग अपने-अपने हिसाब से होली मंगलाते हैं।

होली में होती थी ऐसी ठिठोली

दीपक में रंग भरकर गलियों से गुजरने वालों की पीठ पर उसका छापा लगा देते थे। लोग भी बुरा नहीं मानते थे। डोरी में हुक बांधकर छत से बैठ जाते और राहगीरों की पगड़ी हुक में फंसा ऊपर खींच लेते थे।

घर आती थी होली की ‘गेर’

पहले होली जलाना नहीं कहते थे, बल्कि होली मंगलाना कहते थे। युवा जहां भी लकड़ी का सामान देखते, उसे उठा लाते। लोग घरों के बाहर जलने का सामान नहीं रखते थे। होली के दूसरे दिन मोहल्लों में गीत गाते हुए लोगों की टीम जाती, जिसे ‘गेर’ कहा जाता था। घर पर आने पर लोग उन्हें मिठाई और ठंडाई खिलाते।
प्रो. गोविंद शंकर शर्मा, इतिहासकार व भाषाशास्त्री

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