
चर्चा में डिप्टी मेयर के नाम से लगे बोर्ड
जयपुर. नगर निगम में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की असली तस्वीर शायद सरकारी बोर्ड से ज्यादा साफ कहीं दिखाई नहीं दे सकती। जनता ने जिस उम्मीदवार को सरोज कंवर नाम से चुना, उसी उपमहापौर की पहचान अब बोर्ड पर सरोज रणजीत सिंह सोडाला बन गई है। बोर्ड पर बदला हुआ नाम लोगों को चौंका रहा है।
खास बात यह है कि यह बोर्ड नगर निगम की ओर से ही लगाया गया है। जब बैठकों में पति और ससुर पार्षद प्रतिनिधि बनकर नजर आने लगे हों और अब सार्वजनिक बोर्डों पर भी महिला जनप्रतिनिधि की पहचान पति के नाम से जुड़ने लगे तो सवाल है कि निर्वाचित महिला की अपनी पहचान आखिर पीछे क्यों छूटती जा रही है? नगर निगम की हालिया बैठकों में कुछ महिला पार्षदों के स्थान पर उनके पति और ससुर के पहुंचने की तस्वीरें सामने आई थीं।
इस पर महापौर सुनील कोठारी ने भविष्य में बैठकों में केवल निर्वाचित पार्षदों की मौजूदगी सुनिश्चित करने की बात कही थी। सरोज कंवर के पति रणजीत सिंह सोडाला भाजपा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि की अपनी राजनीतिक पहचान को पर्याप्त प्रमुखता मिल रही है या सार्वजनिक पहचान पति के नाम से जुड़कर सामने आ रही है।
ये बोलीं उपमहापौरः इस मामले में उप महापौर सरोज कंवर ने कहा कि मैंने जिस नाम से नामांकन भरा था, बोर्ड पर वही नाम लगाया गया है। वहीं, बोर्ड लगाने की जिम्मेदारी मुख्यालय की एक्सईएन नीरू छीपा की है। इस मामले में उनसे संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।
जेईएन कमलकांत बैरवा ने बताया कि अभी महापौर और उप महापौर के चार-चार बोर्ड लगाए गए हैं। बोर्ड में पति का नाम लिखे जाने के संबंध में उन्होंने 'दिखवाने' की बात कहते हुए पल्ला झाड़ लिया।
राजनीतिक विशेषज्ञों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, सरकारी बोर्डों पर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के नाम के साथ उनके पति का नाम या पहचान जोड़ना सीधे तौर पर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की मूल भावना पर चोट करता है। भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने महिलाओं को आरक्षण और अधिकार इसलिए दिए हैं ताकि वे समाज में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित कर सकें। जब शासन या प्रशासन स्तर पर ही जनता द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि के आधिकारिक नाम को बदलकर उनके परिवार या पति के नाम से प्रचारित किया जाता है, तो यह दर्शाता है कि सत्ता और प्रशासनिक ढांचे में पितृसत्तात्मक मानसिकता आज भी कितनी गहरी है। यह प्रवृत्ति महिला नेताओं की स्वतंत्र योग्यता और उनकी संवैधानिक हैसियत को कमतर आंकने की कोशिश जैसी है।
प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसी भी जनप्रतिनिधि की आधिकारिक पहचान केवल उन्हीं दस्तावेजों से तय होती है, जो उन्होंने अपने नामांकन पत्र में दाखिल किए हैं। स्वायत्त शासन विभाग के नियमों और न्यायिक दिशा-निर्देशों के मुताबिक, निर्वाचित महिलाओं के कामकाज में उनके पतियों या रिश्तेदारों के दखल पर सख्त पाबंदी है।
बोर्ड पर इस तरह नाम बदलना जमीनी स्तर पर चल रही 'पति-प्रतिनिधि' या 'सरपंच-पति' संस्कृति को संस्थागत मान्यता देने जैसा खतरनाक कदम है। यह प्रशासनिक नियमों की अनदेखी तो है ही, साथ ही यह उन मतदाताओं के भरोसे का भी अपमान है जिन्होंने एक स्वतंत्र महिला उम्मीदवार के तौर पर सरोज कंवर को अपना मत देकर चुना था। लोकतान्त्रिक संस्थाओं को ऐसी प्रथाओं को हतोत्साहित करना चाहिए ताकि प्रशासनिक शुचिता बनी रहे।
Updated on:
23 Oct 2026, 8:21 AM IST
Published on:
23 Oct 2026, 8:20 AM IST
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