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Jaipur Narsingh Leela: 40 डिग्री गर्मी और 140kg की ड्रेस! ताड़केश्वर मंदिर में आज खंभा फाड़ प्रकट होंगे ‘नृसिंह अवतार’

Jaipur Narsingh Leela 2026: इन मुखौटों में देखने की सुविधा सीमित होती है, इसलिए लीला के दौरान एक व्यक्ति टॉर्च लेकर आगे चलता है, जबकि दूसरा व्यक्ति पंखे से हवा करता रहता है।

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Narsingh Leela Jaipur 2026 Live

narsing leela dress or face photo

Tadkeshwar Mahadev Temple Jaipur: राजधानी जयपुर में 250 साल पुरानी नृसिंह लीला और वराह लीला की परंपरा एक बार फिर जीवंत होने जा रही है। ताड़केश्वर महादेव मंदिर के सामने हर वर्ष वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को इस भव्य आयोजन का मंचन होता है। खास बात यह है कि नृसिंह और वराह भगवान के मुखौटे सालभर मंदिर के गर्भगृह में सुरक्षित रखे जाते हैं और केवल इसी दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए बाहर निकाले जाते हैं। व्यास परिवार के सदस्य ही इन स्वरूपों को धारण करते हैं और विधि.विधान से पूजा के बाद शहर में लीला का प्रदर्शन करते हैं।

खंभा फाड़कर प्रकट होते हैं नृसिंह, धरती चीरकर आते हैं वराह

इस आयोजन की सबसे अनोखी बात इसका मंचन है। मंदिर के सामने विशेष स्टेज तैयार किया जाता है, जहां नृसिंह भगवान खंभे को फाड़ते हुए और वराह भगवान धरती को चीरते हुए प्रकट होते हैं। नृसिंह स्वरूप का वजन करीब 51 किलो यानी सवा मण और वराह स्वरूप लगभग 90 किलो का होता है। इन पर सोने और चांदी का वर्क किया गया है। लीला के दौरान ये स्वरूप त्रिपोलिया गेट, बाजारों और प्रमुख मार्गों से होते हुए पुनः मंदिर पहुंचते हैं, जहां भक्तों को छत से दर्शन दिए जाते हैं। इस दौरान आतिशबाजी और भव्य शोभायात्रा भी आकर्षण का केंद्र रहती है। ये आयोजन करीब दो घंटे तक का होता है। इस दौरान लगातार नृत्य चलता है।

40 डिग्री गर्मी में 140 किलो का भार, फिर भी अटूट आस्था


जयपुर में इन दिनों तापमान 40 से 42 डिग्री तक है, ऐसे में लगभग 140 किलो वजन के भारी स्वरूप को धारण कर दो घंटे तक नृत्य करना किसी तपस्या से कम नहीं है। इन मुखौटों में देखने की सुविधा सीमित होती है, इसलिए लीला के दौरान एक व्यक्ति टॉर्च लेकर आगे चलता है, जबकि दूसरा व्यक्ति पंखे से हवा करता रहता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इन स्वरूपों को धारण करता है, उसमें भगवान का भाव आ जाता है। श्रद्धालु नृसिंह अवतार की जटा को प्रसाद स्वरूप अपने साथ ले जाते हैं और बच्चों को ताबीज की तरह पहनाते हैं। यह अद्भुत परंपरा आस्था, इतिहास और साहस का संगम है, जो 250 साल बाद भी जयपुर की पहचान बनी हुई है।