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जाट और राजपूत का सियासी दबदबा, तीन तथ्यों से समझें दबदबे का गणित

ये तीन तस्वीरें राजस्थान की राजनीति में दशकों से चली आ रही जाट-राजपूत राजनीति की कहानी को समझने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।

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rajasthan election 2018

अनंत मिश्रा/जयपुर। ये तीन तस्वीरें राजस्थान की राजनीति में दशकों से चली आ रही जाट-राजपूत राजनीति की कहानी को समझने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है। इन तस्वीरों से साफ होता है कि पहले विधानसभा चुनाव में 54 सीटों पर राजपूत विधायक जीते तो अगले चुनाव में यह संख्या घटकर 26 रह गईं।

इसके विपरीत 1952 के पहले चुनाव में जाट प्रत्याशी 12 सीटों पर जीते थे, अगले चुनाव में इनकी संख्या बढ़कर 23 पहुंच गई। इसके बाद से दोनों में आगे एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ चलती रही। ये तो हुआ कहानी का एक भाग। इसको गहराई से समझने के लिए कहानी का दूसरा और अहम भाग यह है कि प्रदेश में अब तक तीन बार राजपूत मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

तो जाटों को अपने पहले मुख्यमंत्री का इंतजार है। ये बहस अलग है कि मुख्यमंत्री या विधायक चुनने में जाति का पैमाना क्यों? भाजपा के दिग्गज नेता भैरोंसिंह शेखावत 1977, 1990 और 1993 में मुख्यमंत्री की कुर्सी को सुशोभित कर चुके हैं।

जयपुर में खींवसर के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल की किसान हुंकार रैली को इसी सियासी आकांक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। राजस्थान की राजनीति में जाटों के राजनीतिक दबदबे को कम करके नहीं आंका जा सकता।

आजादी के बाद से अब तक नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, कुंभाराम आर्य, दौलत राम सारण, कमला बेनीवाल, परसराम मदेरणा, सुुमित्रा सिंह और शीशराम ओला सरीखे जाट नेता प्रदेश और केंद्रीय राजनीति में दशकों तक छाए रहे।

महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिल पाने की टीस हर चुनाव में रह-रहकर उभर आती है। किसानों को एकजुट करने के नाम पर बेनीवाल जाट समाज को एक मंच पर लाने की कोशिशों में महीनों से जुटे हैं। भाजपा से अलग होकर किसानों की राजनीति करने वाले बेनीवाल की नजर भी मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर टिकी है।

एकाध रैली से प्रदेश की राजनीति के भविष्य को आंकने की कोशिश करना जल्दबाजी हो सकता है। लेकिन इतना तय है कि हर चुनाव की तरह इस बार भी प्रदेश में जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश हर तरफ से होगी। ये बात अकेले राजस्थान पर ही लागू नहीं होती।

देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश हो या बिहार, पड़ोसी राज्य गुजरात हो अथवा हरियाणा, जातीय संतुलन को साधने की कवायद हर जगह देखने को मिलती है। राजनीति से जातिवाद के दंश को हटाने की बातें कितनी भी क्यों न कर ली जाएं लेकिन राजनीति के मैदान की जमीनी हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

बीकानेर जिले की कोलायत सीट से लगातार आठ बार राजपूत, तो सीकर जिले की दांता रामगढ़ विधानसभा सीट से लगातार 8 बार जाट प्रत्याशी के जीतने को क्या माना जाए? विधानसभा चुनाव में झुंझुनूं जिले की झुंझुनूं और मंडावा तो चूरू जिले की सादुलपुर सीट पर सभी दल जाट प्रत्याशी पर ही दावं खेलते है।

नागौर, चूरू, सीकर और झुंझुनूं लोकसभा सीट से पिछले छह-सात चुनाव में जाट उम्मीदवार ही विजय पताका फहराता आ रहा है।

राजनीतिक दल चुनावी मंचों से बात तो 36 कौम की करते हैं लेकिन हर सीट पर अलग-अलग तरीके से जातीय समीकरणों को उछालने से भी नहीं चूकते। बेनीवाल की रैली के बाद उभरने वाले राजनीतिक और जातीय समीकरणों का असर देखने को मिल सकता है।

राजस्थान की राजनीति इस बार क्या करवट लेगी यह समय ही बताएगा लेकिन जातिगत राजनीति के दावं पेंच में हर बार की तरह इस बार भी नए रंग देखने को जरूर मिलेंगे।


तीन तथ्यों से समझें दबदबे का गणित
राजपूत विधायक---------जाट विधायक
तस्वीर-1 ------------तस्वीर-2--------------- तस्वीर-3
पहला चुनाव- 1952---दूसरा चुनाव-1957----------14वां चुनाव-2013
कुल सीट- 160-----कुल सीट- 160--------------------कुल सीट- 200
54---------------26-------------------------27
12--------------23------------------------32


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