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16 साल बाद मिला न्याय: फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आरोप से कर्मचारी दोषमुक्त, पुलिस नहीं पेश कर पाई एक भी गवाह

अदालत ने एक सरकारी कर्मचारी को 16 साल के लंबे इंतजार के बाद 'फर्जी जाति प्रमाण पत्र' के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है।
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Rajasthan High Court objects to repeated summons in name of disability test Said not to misuse law

फाइल फोटो पत्रिका

जयपुर। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने के मामलों के बीच एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अदालत ने एक सरकारी कर्मचारी को 16 साल के लंबे इंतजार के बाद 'फर्जी जाति प्रमाण पत्र' के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। विडंबना यह है कि साल 2009 से लंबित इस मामले में पुलिस 16 सालों में कोर्ट के सामने एक भी ठोस सबूत या गवाह पेश नहीं कर सकी। एसीजेएम-6 कोर्ट के पीठासीन अधिकारी कन्हैयालाल पारीक ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियुक्त के खिलाफ कोई भी मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे अभियोजन की कहानी की पुष्टि हो सके। ऐसे में आरोपी कर्मचारी नाथूलाल को बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया गया।

40 साल पहले तहसील की गलती, कर्मचारी ने भुगता नतीजा

इस पूरे मामले की जड़े 40 साल पुरानी हैं। नाथूलाल के अधिवक्ता हितेश बागड़ी ने बताया कि यह विवाद 3 दिसंबर 1985 को शुरू हुआ था, जब जयपुर तहसील ने ही नाथूलाल (जो धोबी जाति से होने के कारण एससी वर्ग में आते थे) को भूलवश अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया था। रिकॉर्ड के अनुसार उस दौरान न केवल नाथूलाल बल्कि घनश्याम बैरवा जैसे कई अन्य अनुसूचित जाति के लोगों को भी प्रशासन ने एसटी के प्रमाण पत्र दे दिए थे। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर नाथूलाल ने साल 2001 में त्रिवेंद्रम में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नौकरी हासिल की थी।

हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी जांच की आंच

नौकरी लगने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के एक निर्देश पर 1 जनवरी 1995 के बाद एसटी वर्ग में नियुक्त हुए सभी कार्मिकों के दस्तावेजों की जांच शुरू हुई। जब नाथूलाल के प्रमाण पत्र की जांच जयपुर तहसीलदार से करवाई गई तो जवाब आया कि वे एससी (अनुसूचित जाति) में आते हैं और उन्होंने प्रमाण पत्र में 'जन' शब्द जोड़कर उसे अनुसूचित जनजाति का बनाया है। इसी आधार पर 1 अप्रैल 2009 को उनके खिलाफ रिपोर्ट पेश की गई और कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने उनके जीवन के 16 बेशकीमती साल लील लिए।

16 साल का इंतजार, पर पुलिस के हाथ खाली

अदालत में पैरवी के दौरान अधिवक्ता भंवर बागड़ी और हितेश बागड़ी ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष ने 16 साल के लंबे अंतराल के बावजूद एक भी गवाही नहीं कराई। कोर्ट ने माना कि यदि पुलिस अनिश्चित काल तक साक्ष्य पेश नहीं कर पाती है तो त्वरित न्याय के सिद्धांत के तहत आरोपी को राहत मिलनी चाहिए। कर्मचारी पर आरोप तो तय हुए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए पुलिस ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। साक्ष्य के अभाव में पुलिस की पूरी थ्योरी कोर्ट में धराशायी हो गई।

त्वरित न्याय के हित में कोर्ट का बड़ा फैसला

कोर्ट ने अपने फैसले में 'त्वरित न्याय' को सर्वोपरि माना। पीठासीन अधिकारी ने कहा कि पत्रावली पर कोई साक्ष्य न होना यह दर्शाता है कि अभियोजन पक्ष अपना पक्ष साबित करने में विफल रहा है। इस फैसले ने न केवल नाथूलाल को बेदाग साबित किया है, बल्कि उन सिस्टम की खामियों को भी उजागर किया है जहां तहसील की एक पुरानी क्लर्कल गलती का खामियाजा एक कर्मचारी को अपने पूरे करियर के दौरान भुगतना पड़ा। 16 साल के मानसिक और आर्थिक संघर्ष के बाद अब नाथूलाल को राहत मिली है।

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