
Kaal Bhairav Jayanti Kab Hai Importance Of Kaal Bhairav Puja
जयपुर. मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है। भैरव को शिव का रुद्रावतार भी माना जाता है। इनके अनेक रूप हैं जिनमें कालभैरव भी हैं जोकि भगवान का युवा और साहसिक रूप हैं। काल भैरव की आराधना से आसन्न संकट से मुक्ति मिलती है, शत्रु शांत होते हैं और कोर्ट-कचहरी आदि के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि काल भैरव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में अवतरित हुए थे। यही कारण है कि इस दिन कालभैरवजी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। उनकी पूजा से सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है और उपासना करनेवालों में साहस का संचार होता है।
कुंडली में शनि, राहू—केतु आदि क्रूर ग्रहों की शांति कालभैरव की उपासना से ही संभव है। खासतौर पर राहू की महादशा में एकमात्र भैरव की साधना से ही राहत मिलती है. कालभैरव की पूजा—अर्चना करने से शनि का प्रकोप भी कुछ हद तक शांत हो जाता है। कालाष्टमी पर कालभैरव की पूजा कर उनके सरल मंत्र ।। ॐ भैरवाय नम:।। का जाप करना चाहिए।
श्री लिंगपुराण के अनुसार दारुक नामक असुर का वध करने के लिए माता पार्वती देवी काली के रूप में प्रकट हुई। असुर को भस्म करने के बाद मां काली का क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था तब शिवजी बीच में आए। शिवजी के 52 टुकड़े हो गए जोकि 52 भैरव कहलाए। इन 52 भैरवों ने मिलकर भगवती के क्रोध को शांत किया।
देवी ने भैरव व उनके भक्तों को काल के भय से मुक्त कर दिया तभी से वे कालभैरव कहलाए। इसके साथ ही भैरवजी को काशी का आधिपत्य भी दे दिया। काले रंग के कुत्ते को कालभैरव की सवारी माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार काले कुत्ते को रोटी खिलाने से कालभैरव प्रसन्न होते हैं। उनका उपासक आकस्मिक मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
Published on:
03 Dec 2020 06:41 pm
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