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कथक बन रहा आम लोगों की पसंद: हरीश गंगानी

वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए अब किसी कथक घराने का अपनी शैली पर एकाधिपत्य रखना उचित नहीं है। हर घराने को अपनी इज़ाद की कई कथक की बारीकियां, लय-ताल एक-दूसरे से आदान-प्रदान करनी चाहिए।

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Kathak dance Guru harish gangani

जयपुर। वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए अब किसी कथक घराने का अपनी शैली पर एकाधिपत्य रखना उचित नहीं है। हर घराने को अपनी इज़ाद की कई कथक की बारीकियां, लय-ताल एक-दूसरे से आदान-प्रदान करनी चाहिए। तभी कथक अपना स्थान बरकरार रखने के साथ ही आधुनिक नृत्यों के समक्ष खुद को बेहतर सिद्ध कर सकता है। कथक घराने अब इस बात को समझ चुके हैं और ऐसा कर भी रहे हैं। इसी का नतीजा है कि कथक अब नृत्य-मिश्रण यानी फ्यूजन से लोकप्रियता के साथ-साथ अपनी शैली का वज़न भी साबित कर रहा है। इतना ही नहीं, इन घरानों के तालमेल ने कथक को नया और बेहतरीन आयाम दिया है, जिससे कथक अब आमजन की पसंद में शुमार होने लगा है।

कथक के विकास और बेहतरी के लिए यह कहना है जयपुर घराने के कथक गुरु पंडित हरीश गंगानी ने। वे कहते हैं आज ओवर नाइट लोकप्रिय होने वाले डांस रातों-रात ही गुमनामी के अंधेरे में गुम हो जाते हैं। उनमें धूम-धड़ाका, एक्रोबेट और मार्केटिंक तो है, लेकिन स्थायीत्य और क्लास की कमी है। इसीलिए उनमें कथक की तरह अक्षुण्ण पहचान बनाए रखने की क्षमता नहीं रह पाती। नृत्य जितनी मेहनत दिन-प्रतिदिन मांगता है, उतनी आधुनिक नृत्यों में नहीं होती।

महान कलाकारों ने भी अपनाया फ्यूजन
कथक गुरु गंगानी ने बताया कि पंडित रविशंकर ने बिटल ब्रदर्स (जॉर्ज हैरिसन) के साथ शास्त्रीय और वेस्टर्न म्यूजिक का फ्यूजन किया। उनके इस प्रयोग ने अमेरिका के संगीत प्रेमियों ही नहीं आम लोगों के दिलों में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति सम्मान पैदा किया और वे लोग इसे पसंद करने लगे। इसी तरह, तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन साहब ने यूरोपियन गिटारिस्ट के साथ शक्ति बैंड बनाया तो यूरोप में भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान बनी और इसे पसंद किया जाने लगा। इन लोगों ने साबित कि किसी अपनी शैली छोड़े बगैर भी अन्य शैलियों को पसंद करने वालों के दिलों पर राज किया जा सकता है।

9 वर्ष की उम्र से कथक
गंगानी ने बताया कि उन्हें कथक विरासत में मिला। पिता पंडित कुंदनलाल गंगानी प्रसिद्ध कथक डांसर और गुरु थे। ऐसे कथक साधक पिता के सान्निध्य में नौ वर्ष की उम्र में ही कथक को अपना लिया। बाद में युवावस्था में क्रिकेट की ओर रुझान बढ़ा, लेकिन पिता के निधन के बाद मां के आदेश पर फिर कथक की साधना शुरू की। तब से अब तक जयपुर घराने का नाम आगे बढ़ाने का प्रयास जारी है।