जयपुर में नृसिंह के चार रूप है। पहले में नृसिंह पहाड़ तोड़ कर बाहर निकल रहे हैं। दूसरे स्थान रूप नृसिंह हिरण्य कश्यप का वध कर रहे हैं। तीसरे अभय नृसिंह है, जिनके पास भक्त प्रहलाद खड़े हैं। चौथे लक्ष्मी नृसिंह भगवान के चरणों की पूजा होती है। बालानंद मठ में लक्ष्मी नरसिंह की पूजा होती है। ढूंढाड़ के गांवों और शहरों में नृसिंह भगवान के दर्जनों मंदिर हैं। जयपुर में कोई भी मंदिर बनता तब उस मंदिर की रक्षा के लिए पहले सालगराम नृसिंह की स्थापना की जाती थी।
आमेर में विराजे नृसिंह की साक्षी में महाराजा का राजतिलक होता था। आमेर नृसिंह मंदिर और बालाबाई के महल में युवराज से महाराजा बनने वाले को पूर्वज राजाओं की तलवार के पास आंख पर पट्टी बांध ले जाया जाता था। जिस राजा की तलवार को वह उठा लेता तो उसका नाम भी उस राजा के नाम पर हो जाता। जैसे माधो सिंह द्वितीय का मूल नाम कायम सिंह था। उन्होंने पूर्वज माधो सिंह प्रथम की तलवार उठाई। तब उनका नाम माधो सिंह द्वितीय हो गया। अन्तिम महाराजा मान सिंह का जन्म नाम मोर मुकुट सिंह था।