
जयपुर।
गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का अंतिम संस्कार आज उनके पैतृक गांव करौली स्थित मूंडिया में दोपहर साढ़े तीन बजे होगा। इधर, कर्नल बैंसला का पार्थिव देह जयपुर स्थित आवास से आज सुबह करौली के लिए रवाना हुआ। इस दौरान उनके परिवारजन और बड़ी संख्या में समर्थक मौजूद रहे। जयपुर से करौली के बीच निकल रही अंतिम यात्रा विभिन्न मार्गों से होते हुए गुज़र रही है, जहां बैंसला समर्थक और गुर्जर समाज के लोग उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार की मांग
कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का राजकीय सम्मान जे साथ अंतिम संस्कार किए जाने की मांग भी उठ रही है। राज्यसभा सांसद डॉ किरोड़ी लाल मीणा सहित गुर्जर समाज के कई नेताओं ने इस सिलसिले में सरकार से मांग की है। सांसद किरोड़ी मीणा ने कहा कि कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला एक संघर्षशील नेता थे, जिन्होंने सुदीर्घ काल तक देश की सेना में रहकर राष्ट्रसेवा में अपना जीवन लगाया है। यह ज़रूरी है कि उनका अंतिम संस्कार संपूर्ण राजकीय सम्मान के साथ होना चाहिए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इन मार्गों से होकर गुज़र रही अंतिम यात्रा
कर्नल बैंसला के पार्थिव देह की अंतिम यात्रा आज सुबह करीब 6 बजे जयपुर से रवाना हुई। यात्रा दौसा, सिकंदरा, पाटोली, महुआ और गाज़ीपुर के रास्ते करौली स्थित उनके पैतृक गांव पहुंचेगी, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
प्रतिमाएं लगेगी, लगेंगे मेले!
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कर्नल बैंसला की गुर्जर समाज के लिए दिए गए योगदान को देखते हुए राज्य में जगह-जगह कर्नल बैंसला की प्रतिमाएं लगाई जाएंगी। इन प्रतिमा स्थलों पर हर साल मेलों का आयोजन भी किया जाएगा। वहीं देश के पवित्र स्थानों पर बैंसला के अस्थि विसर्जन का कार्यक्रम भी बनाया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति अपने नेता को श्रद्धांजलि देने और उनके योगदान को हमेशा याद रखने के लिए रूपरेखा बना रहा है। इन आगामी कार्यक्रमों को लेकर जल्द ही औपचारिक व आधिकारिक जानकारी दी जाएगी।
1965 के युद्ध में पाकिस्तान युद्धबंदी भी रहे थे
बैंसला भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स में भर्ती हुए थे। उन्होंने 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध और 1965 में भारत-पाक युद्द में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे, वो 1965 के युद्ध में पाकिस्तान युद्ध बंदी भी रहे थे। दुश्मन को सामने देखकर भी वो कभी डरे नहीं इसलिए उनके सीनियर्स उन्हें 'जिब्राल्टर का चट्टान' कहते थे और साथी कमांडो 'इंडियन रेम्बो' कहते थे।
Published on:
01 Apr 2022 10:15 am
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