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इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व सीजे माथुर बोले, विधिक सेवा एक लीगल ट्यूरिज्म की तरह

राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस विशेष
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जयपुर। विधिक सेवा की परिकल्पना को गरीब के लिए न्याय रो साथी कहा जाता है। इसके उद्देश्याें को पूरा करने के लिए आजादी के 100 वें वर्ष के लिए किस तरह की तैयारी की आवश्यकता है, इन्हीं पहलुओं पर संवाददाता शैलेन्द्र अग्रवाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर से बात की। पूर्व न्यायाधीश माथुर ने कहा, इस व्यवस्था के लिए लीगल ट्यूरिज्म शब्द सटीक है।

सवाल-विधिक सेवा के 35 साल में विधिक जागरुकता का कितना कार्य पूरा कर पाए हैं?जवाब- विधिक सेवा प्राधिकरण व्यवस्था के असर के बारे में समीक्षा होनी चाहिए। लोक अदालत में मुकदमे तय होने की बात कही जाती है, लेकिन मुकदमों की संख्या तो कम नहीं हो रही। लोक अदालत में निस्तारण का आंकड़ा कई लाख बताया जाता है, लेकिन लंबित मुकदमों में तो राजस्थान देश में दूसरे नंबर पर आ गया है। विधिक सेवा के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। पर ऐसा कोई खास रिटर्न नहीं मिलता, जिस पर गर्व कर सकें। न्यायिक अधिकारी नियमित कार्य के बजाय इसी में व्यस्त रहते हैं। विधिवेत्ता ए जी नूरानी लीगल ट्यूरिज्म शब्द का इस्तेमाल किया करते थे, जो इस तरह की व्यवस्था के लिए सटीक है।

सवाल- आजादी के 100 वें वर्ष 2047 के लिए विधिक सेवा को लेकर क्या तैयारी होनी चाहिए?जवाब- यह पहला अधिनियम था, जिसके अन्तर्गत सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश को प्रशासनिक कार्य में लगाया गया। नालसा चेयरमैन देश का नंबर-2 न्यायाधीश होता है, जो प्रशासनिक कार्य में व्यस्त रहता है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की जरुरत नहीं है, राज्य प्राधिकरण ही पर्याप्त हैं। एमएसीटी जज के पद सेवानिवृत अधिकारियों से भरा जाए , इससे सेवारत अधिकारियों को नियमित अदालतों में लगाकर मुकदमों में कमी लाई जा सकती है।

सवाल- विभिन्न योजनाओं में 8 लाख रुपए सालाना से कम आय वालों को कमजोर आय वाला मानते है, विधिक सेवा में आय सीमा तीन लाख रुपए है। क्या यह सही है?जवाब- अनुसूचित जाति, जनजाति व महिलाओं में 3 लाख रुपए से कम आय वाले कितने ही हैं, जो अपना वकील करना पसंद करते हैं। अन्य कहीं काम नहीं, वे अधिवक्ता जैसे-तैसे विधिक सेवा प्राधिकरण के पैनल में आने का प्रयास करते हैं। कानून अच्छी मंशा से लाए, लेकिन बार कौंसिल, बार एसोसिएशन व विधि संस्थानों को जोड़े बिना उद्देश्य पूरी नहीं हो पाएगा। सेवानिवृत न्यायिक अधिकारी भी साथ नहीं लिए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट न्यायाधीशों के मूवमेंट पर जो खर्चा होता, उसके बारे में भी सोचना चाहिए। राष्ट्रीय व राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के न्यूजलेटर व मैंगजीन में जागरुकता सामग्री से ज्यादा समाचारों की क्लिपिंग व फोटो होते हैं।

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