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जयसिंह राजा हुए तपधारी, जैपर नगर बसायो भारी

Maharaja Sawai Jai Singh II: हिन्दू धर्म में बिखरे हुए देश के धार्मिक सम्प्रदायों को एकता के सूत्र में पिरोने का सबसे बड़ा काम महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने किया। संतों की त्यागमयी प्रतिष्ठा में बाधक बन रहे बाबाओं के लिए मथुरा के पास वैराग्यपुरा बनाया था।

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जितेंद्र सिंह शेखावत
जयपुर। Maharaja Sawai Jai Singh II: हिन्दू धर्म में बिखरे हुए देश के धार्मिक सम्प्रदायों को एकता के सूत्र में पिरोने का सबसे बड़ा काम महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने किया। संतों की त्यागमयी प्रतिष्ठा में बाधक बन रहे बाबाओं के लिए मथुरा के पास वैराग्यपुरा बनाया था। विवाह कर गृहस्थी बसाने के इच्छुक बाबाओं को यहां बसाया गया।

हिन्दू धर्म का उद्धारक माने जाने वाले इस महाराजा ने मथुरा की सूबेदारी के समय संतों में त्याग परम्परा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। उन्होंने हिन्दू समाज के चार सम्प्रदायों में श्री, रुद्र, सनक और ब्रह्म को एक सूत्र में पिरोया। ज्योतिष, खंगोलशास्त्र और वैदिक परम्परा को ऊंचा उठाया। कलयुग का पहला अशवमेध यज्ञ का आयोजन कर धर्म ध्वजा को विश्व में फहराया।

जयसिंह ने अयोध्या सहित देश में एक सौ से ज्यादा जयसिंहपुरे बसाने के बाद विश्व विख्यात जयपुर को वास्तु शिल्प के आधार पर बसाया। वर्ष 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद जयसिंह ने अवध नवाब बुरहान खान से अयोध्या में जमीन खरीदी और वहां पर वैष्णव नागा अखाड़ों को स्थापित किया। इतिहासकार आर.नाथ ने लिखा है कि जयसिंह ने सरयू नदी पर धार्मिक अनुष्ठान भी करवाया था। बालानंद मठ से जुड़े देवेन्द्र भगत के मुताबिक जयसिंह ने मथुरा के कृष्ण जन्म स्थान केशवदेवजी मंदिर में अपनी एक पुत्री का विवाह जन्माष्टमी के दिन करवाया। वृंदावन मे जयसिंह का घेरा आज भी मशहूर है। कृष्ण रास लीला की तर्ज पर देवर्षि श्री कृष्ण भट्ट से राम रासो गीतिका ग्रंथ लिखवाया।

जयसिंह का पुष्कर तीर्थ के अलावा हरिद्वार, काशी, उज्जैन,मथुरा आदि तीर्थ स्थानों से काफी लगाव रहा। इतिहास के मुताबिक सवाई जयसिंह द्वितीय अपने समय के पहले हिन्दू महाराजा रहे जिन्हें मुगल सम्राट ने सात हजारी मनसब का सम्मान दे रखा था। जयसिंह की सेना में 80 हजार घुड़सवारों की बड़ी सैन्य ताकत थी। औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई का खिताब दिया था। पचास से ज्यादा युद्धों में विजयी रहने वाले जयसिंह ने विश्व विख्यात जयपुर नगर बसाया। नौ गृहों के हिसाब से बसाए जयपुर के एक भाग का नामकरण चौकड़ी रामचन्द्रजी रखा गया।