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Shardiya Navratri 2018: नौ दिन में सात दिन विशेष योग, जानें इस बार की नवरात्रि की विशेष बातें

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navratri 2018

जयपुर।

शारदीय नवरात्र (Shardiya navratri 2018) के नौ दिनों में इस बार 7 विशेष संयोग बन रहे हैं, जिनमें मां भगवती की आराधना विशेष फलदायी रहेगी। इन संयोगों पर खरीदारी भी शुभ फलदायी रहेगी। इसमें रवियोग, राजयोग, कुमार योग, स्र्वार्थ सिद्धि योग का संयोग रहेगा। आमेर स्थित शिला माता मंदिर में नौ दिनों तक भक्तों की भीड़ माता के दर्शनों के लिए उमड़ेगी।

पं. बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि शिला माता मंदिर में सवेरे 6:31 बजे घट स्थापना होगी। इसके बाद 7:31 बजे दर्शनों के लिए पट खुलेंगे। सुबह 8 से 8:15 बजे तक बालभोग लगेगा और 10 बजे माता की आरती होगी। 11 बजे राजभोग लगेगा और शाम 6:45 बजे संध्या आरती और रात 8:30 बजे शयन आरती होगी। 14 अक्टूबर को छठ का मेला भरेगा। मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए प्रशासन ने विशेष व्यवस्था की है। दुर्गापुरा स्थित प्राचीन दुर्गा माता के मंदिर में महंत महेंद्र भट्टाचार्य के सान्निध्य में सुबह 6:31 बजे घट स्थापना की जाएगी। इसके बाद अखंड ज्योत प्रज्जवलित की जाएगी। इससे पहले मंगलवार को शहर में पूजन सामग्री खरीदने वालों की भीड़ उमड़ी।

सप्तमी का मेला भरेगा
कनक घाटी स्थित मंदिर देवी श्रीमनसा माता में महंत अंजनकुमार गोस्वामी के सान्निध्य में सुबह 9:11 बजे घट स्थापना के साथ नवरात्र की शुरुआत होगी। प्रवक्ता मानस गोस्वामी ने बताया कि चंडीपाठ, शृंगार एवं पुष्पांजलि के विशेष कार्यक्रम नवरात्र में होंगे। राजपार्क स्थित वैष्णो देवी मंदिर सहित सभी प्रमुख देवी मंदिरों में शुभ मुहूर्त में घट स्थापना होगी। मंदिरों में दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालिसा के पाठ होंगे।

ये बनेंगे विशेष योग
नवरात्र के पहले दिन 10 अक्टूबर को सुबह 7:30 से 11 बजे तक राजयोग, 12 अक्टूबर सुबह 10:40 से 3 बजे तक रवियोग, 13 अक्टूबर सुबह 6:30 से 11:35 बजे रवि योग, 14 अक्टूबर को दोपहर 1:15 से दूसरे दिन सुबह 6 बजे तक स्वार्थसिद्धि योग, 15 अक्टूबर को सूर्योदय से कुमार योग और इसी दिन ३:30 बजे तक रवि योग रहेगा। इसके बाद 16 अक्टूबर सूर्योदय से 10:17 बजे तक राजयोग, 17 अक्टूबर को राजयोग और 18 अक्टूबर को रवियोग संपूर्ण दिन-रात रहेगा।


नवरात्र के पहले दिन होगी मां दुर्गा के दो स्वरूपों की पूजा
नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री स्वरूप की पूजा होती होगी। हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण शैलपुत्री हुआ। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। शैलपुत्री देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। यह सती के नाम से भी जानी जाती है। मां के इस स्वरूप को सौभाग्य और शांति का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि मां शैलपुत्री की विधि पूर्वक पूजा करने से मन कभी अशांत नहीं रहता और घर में सौभाग्य का आगमन होता है। मां शैलपुत्री स्थायित्व, शक्तिमान का वरदान देती हैं।

मां की उपासना का मंत्रवन्दे वांछित लाभाय चन्द्राद्र्वकृतशेखरामवृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम

दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है। मांं ब्रह्मचारिणी अपने दाहिने हाथ में माला तथा बाएं हाथ में कमंडल लेकर रखती है। हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए, मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

मां की उपासना का मंत्र दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलूदेवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम

(नोट-बंशीधर पंचाग के निर्माता पं.दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार पहले दिन तिथि क्षय के कारण देवी के दो स्वरूपों शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। बाद में षष्ठी तिथि की वृद्धि होने से नवरात्र पूरे नौ दिन के होंगे।)