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Jaipur: नर्सिंगकर्मी की मौत के बाद गर्भवती पत्नी और बेटे का रो-रोकर बुरा हाल, नौकरी जाने का दर्द नहीं सह पाया दीपक

Jaipur Nursing Worker Death Case: जयपुर में संविदा नर्सिंगकर्मी दीपक खारवाल की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। गर्भवती पत्नी और साढ़े तीन साल के बेटे का रो-रोकर बुरा हाल है।

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Jaipur Nursing Worker Death Case

हनुमान बेनीवाल को व्यथा बताता पीड़ित परिवार का फोटो: पत्रिका

Protest After Nursing Worker Deepak Kharwal Died: सिस्टम की बेरहमी और ठेकेदारी प्रथा की क्रूरता ने एक और युवा की जान ले ली। 7-8 हजार की मामूली पगार पर साढ़े तीन साल तक मरीजों की सांसें बचाने वाला 25 साल का दीपक खारवाल इस सिस्टम का शिकार बन गया। नौकरी से निकाले जाने के बाद शुक्रवार को दीपक ने जहर खाकर जान दे दी। उसकी मौत के बाद एसएमएस अस्पताल की इमरजेंसी में हंगामा खड़ा हो गया। चार घंटे तक चले बवाल, पुलिस-नर्सिंगकर्मियों की झड़प ने सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी।

प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में कार्यरत 400 में से 90 को ही कॉलेज के जरिए सीधे की गई संविदा भर्ती में जगह मिली और 310 को बाहर का रास्ता कर दिया गया। दीपक भी इन्हीें में शामिल था। वह सांगानेरी गेट महिला चिकित्सालय के आइसीयू में कार्यरत था। दीपक के साढ़े तीन साल का बेटा और दो महीने की गर्भवती पत्नी है। पिता पहले ही गुजर चुके थे। पूरे घर का बोझ अकेले दीपक के कंधों पर था। मौत के बाद से ही पत्नी और बेटे का रो-रोकर बुरा हाल है।

मौत से पहले तक लड़ता रहा

निकाले जाने के बाद से दीपक बहाली की मांग को लेकर एसएमएस मेडिकल कॉलेज परिसर में चल रहे धरने में शामिल था। शुक्रवार को भी वह साथियों के साथ 11.30 बजे तक प्रदर्शन कर रहा था। दोपहर में अचानक वह आनंदपुरी स्थित अपने कमरे पर गया और जहरीला पदार्थ खा लिया। साथी जब तक उसे एसएमएस इमरजेंसी लेकर पहुंचे, डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

इमरजेंसी में घुसे नर्सिंग कर्मी, पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप

मौत की खबर के बाद सैकड़ों नर्सिंगकर्मी इमरजेंसी के बाहर जमा हो गए। गुस्सा इतना था कि प्रदर्शनकारी इमरजेंसी के भीतर घुस गए। पुलिस ने रोका तो जमकर धक्का-मुक्की हुई। हालात इतने बिगड़े कि इमरजेंसी के कांच का गेट तक चकनाचूर हो गया। नर्सिंगकर्मियों का आरोप है कि पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया, जबकि पुलिस अफसर हालात काबू करने की दलील देते रहे।

आधे घंटे ठप रही इमरजेंसी, मरीजों में दहशत

बवाल के चलते करीब आधे घंटे तक इमरजेंसी सेवाएं पूरी तरह ठप रहीं। गंभीर मरीजों को गेट पर रोक दिया गया। स्ट्रेचर पर तड़पते मरीज और बिलखते परिजन सिस्टम की इस लड़ाई में पिसते रहे। हालात संभालने के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। शाम पांच बजे तक दीपक का शव इमरजेंसी में ही पड़ा रहा।

800 पदों की भर्ती में भी नहीं मिली जगह

मेडिकल कॉलेजों में नर्सिंगकर्मियों के 800 पदों पर भर्ती की गई। लेकिन साढ़े तीन साल से सेवाएं दे रहे दीपक जैसे अनुभवी कर्मियों को बाहर कर दिया गया। साथियों का आरोप है कि बोनस अंकों के नाम पर खेल होता है। जो कई वर्ष से 7-8 हजार में आइसीयू संभाल रहे थे, उन्हें ठेंगा दिखाकर नई भर्ती की जा रही है।

पीड़ा समझते तो जान बच जाती : अशोक गहलोत

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मौत को सीधे तौर पर भाजपा सरकार की असंवेदनशीलता का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि अगर सरकार संविदा कर्मियों की पीड़ा समझती तो दीपक की जान बच सकती थी। वहीं पूर्व मंत्री खाचरियावास ने इसे सरकार की नीतियों से हुई हत्या करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि परिवारों को सड़क पर लाने का नतीजा सरकार को भुगतना होगा। खाचरियावास ने मामले की निष्पक्ष जांच, मृतक के परिवार को 50 लाख मुआवजा, पत्नी को सरकारी नौकरी और सभी संविदा कर्मियों की सेवा सुरक्षा की मांग की।

मुर्दाघर के बाहर धरना

आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल, कांग्रेस विधायक अमीन कागजी, रफीक खान और पूर्व मंत्री प्रतापसिंह खाचरियावास मौके पर पहुंचे। बाद में जिला कलक्टर संदेश नायक, पुलिस कमिश्नर सचिन मित्तल और मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने नर्सिंग कर्मियों से वार्ता की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। शव को मोर्चरी शिफ्ट करने के बाद भी देर रात तक हंगामा और धरना जारी रहा।

प्लेसमेंट ऐजेंसी के जरिये इन्हें 7-8 हजार का वेतन ही मिल रहा था। हमने सिस्टम को सुधारते हुए 17-18 हजार मासिक वेतन पर नर्सिंग कर्मी रखे हैं। उसमें तय की गई योग्यता अनुसार ही भर्ती की गई है।
डॉ. दीपक माहेश्वरी, प्राचार्य एवं नियंत्रक, एसएमएस मेडिकल कॉलेज

इनाम नहीं, बाहर का रास्ता मिला

करीब 4 वर्ष पहले प्रदेश के करीब 6 हजार नर्सिंग कर्मियों को प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से करीब 7 हजार रुपये मासिक वेतन पर नियुक्त किया गया था। अस्पतालों में नियमित पद खाली होने के बावजूद इनसे ठेका व्यवस्था से काम लिया जाता रहा। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि वर्षों की सेवा के बाद सरकार उन्हें नियमित करेगी लेकिन हाल ही में एनएचएम और राजमेस के माध्यम से नई भर्तियां कर पुरानी संविदा व्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों को हटाया जाने लगा। इसी कारण कर्मचारियों में असुरक्षा और बेरोजगारी का संकट पैदा हुआ।