
राजस्थान विरासतों की धरती से जाना जाता है। यहां कि प्राचीन बावड़ियां तकनीक का एक अनोखा उदाहरण है। जो राजस्थान में सैलानियों के बीच बहुत फेमस है। ये कभी पानी का जमाव करने के लिए बनाई जाती थीं और महलों और किलों को ठंडा बनाए रखने में सहायक थी। देश की टॉप 16 बावड़ियों में से राजस्थान की 5 बावडियां प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं इन बावडियों के बारे में…
इन बावडियों की खासियत यह है कि ये बहुत ही अलग तरह की संरचना में बनी होती हैं। राजस्थान में इन्हें बावड़ी, बावली या वाव के नाम से भी जाना जाता है। ये बावड़ियां भारत की अनोखी वास्तुकला का अद्भुत नमूना हैं। जो खासकर राजस्थान में पाई जाती हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बावड़ियों के आस-पास होने से इलाकों में 10 डिग्री तक तापमान गिर जाता है। जिससे गर्मी के मौसम में राहत मिलती है।
यह राजस्थान के आभानेरी गांव में स्थित है। यह लगभग 30 मीटर (100 फीट) गहरी है। यह भारत की सबसे गहरी और बड़ी बावड़ियों में से एक है। इसका नाम निकुंभ वंश के राजा चंडा के नाम पर रखा गया है और इसका निर्माण 8वीं-9वीं सदी में हुआ था। इसमें 3500 सीढ़ियां हैं जो 13 मंजिल नीचे एक बड़े तालाब तक जाती है। इसे उलटे पिरामिड की शैली में बनाया गया है। बावड़ी कई स्तरों में बांटी गई है, हर स्तर पर अलग-अलग संख्या में सीढ़ियां है। सीढ़ियां इस तरह से डिज़ाइन की गई है कि जल को एक स्तर से दूसरे स्तर तक स्वतंत्र रूप से बहने देती है।
इस बावड़ी में कई स्तंभ और गुंबद हैं। जो इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते है। स्तंभों और गुंबदों पर जटिल नक्काशी है। जिसमें हिंदू पौराणिक कथाओं के विभिन्न देवी-देवताओं का चित्रण है। बावड़ी की दीवारों पर भी सुंदर नक्काशी और मूर्तियां हैं। जो भारतीय पौराणिक कथाओं और इतिहास की घटनाओं को दर्शाती है। इस बावड़ी का डिज़ाइन भी यह सुनिश्चित करता है कि रेतीले इलाकों की बाहरी गर्मी के दौरान छाया और ठंडक मिल सके।
पन्ना मीना का कुंड राजस्थान के जयपुर शहर के आमेर किले के पास स्थित है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। इसे स्थानीय समुदाय ने सोलहवीं सदी में बनवाया था। इसका मुख्य उद्देश्य सूखे मौसम में पानी के संचय का था। इस कुंड की विशेषता यह है कि इसकी वास्तुकला और डिज़ाइन अनूठे हैं। इसमें सीढ़ियां हैं जो पानी के स्तर तक ले जाती हैं। कुंड का निर्माण पारंपरिक राजस्थानी शिल्पकला को दर्शाता है। जिसमें स्तंभों और दीवारों पर जटिल नक्काशी और ज्यामिति रेखाएं हैं।
पन्ना मीना का कुंड का कार्यात्मक आकृति केवल पानी के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के लिए एक सभा स्थल भी रहा है। गर्मियों के मौसम में यह ठंडा आराम देने वाली जगह बनती थी। जहां लोग सामाजिक रूप से मिलने और आराम करने आते थे। पन्ना मीना का कुंड अपने समय के इंजीनियरिंग कौशल और वास्तुकला की प्रशंसा का प्रतीक है। यह जयपुर शहर की भीड़-भाड़ से दूर एक ऐतिहासिक स्थल की तरह खड़ा है। जो अपनी वास्तुकला की सुंदरता और शांत माहौल के लिए आकर्षण है।
तूरजी का झालरा राजस्थान के जोधपुर शहर में स्थित एक प्राचीन बावड़ी है। यह बावड़ी प्राचीन समय की सृजनात्मकता और सुंदर कल्पना का अद्भुत उदाहरण है। जोधपुर आने वाले इतिहास प्रेमियों के बीच यह एक पसंदीदा जगह है। इस बावड़ी को जोधपुर के शासक महाराजा अभय सिंह जी की पत्नी महारानी तंवर जी ने सन् 1740 में बनवाया था। जोधपुर के लोग उन्हें प्यार से "तूरजी जी" कहते थे।
बावड़ियां राजघरानों की महिलाओं द्वारा एक पारंपरिक प्रथा के तहत बनवाई जाती थी। तूरजी का झालरा भी इसी परंपरा का हिस्सा है और यह शहर की पानी संचयन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। उन दिनों महिलाओं के लिए पानी लाना एक मुख्य दैनिक काम था और वे यहां इकट्ठा होकर रोजाना की बातें करती थीं। जिससे एक समुदाय की भावना का विकास होता था।
रानीजी की बाओली, बूंदी शहर में स्थित एक प्रसिद्ध बावड़ी है। जिसे सन् 1699 में रानी नाथावती जी सोलंकी द्वारा बनवाया गया था। वे बूंदी के राजा अनिरुद्ध सिंह की छोटी रानी थी। इस बावड़ी की गहराई 46 मीटर तक है और इसके स्तंभों पर अत्यंत सुंदर नक्काशी है। साथ ही एक ऊँचे तारे वाले दरवाजे भी है। इसकी बहुमंजिला संरचना है, जिसमें प्रत्येक मंजिल पर पूजा स्थल स्थापित है। बाओली का प्रवेश चार स्तंभों वाले एक संकेतक द्वार से होता है। बावड़ी के कोनों में एक-दूसरे को देखने वाले पत्थर के हाथी की मूर्तियां खड़ी हैं, जो इसे अद्वितीय बनाती हैं।
इसे बूंदी की सबसे बड़ी बावड़ी माना जाता है। मध्यकालीन बूंदी में बावडियां नगरवासियों के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक स्थल थीं, जहां वे अपने दैनिक कार्यों के साथ-साथ सामाजिक समर्थन और संवाद का आनंद लेते थे। इस प्राचीन बावड़ी का निर्माण और उसकी सुंदरता वर्तमान समय के पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती है। जो इसे एक अनमोल धरोहर मानते हैं। रानीजी की बाओली आज भी अपने इतिहास और वास्तुकला की अनूठी मिसाल के लिए प्रसिद्ध है।
यह एक भूमिगत बावड़ी है, जो लगभग 600 ईस्वी से हजारों बावड़ियां बनाई गईं, जो सालभर पानी उपलब्ध कराती थीं। ये वास्तुकला, इंजीनियरिंग और कला के अद्भुत नमूने थी। नीमराना की बावड़ी, जो दिल्ली-जयपुर हाईवे से कुछ किलोमीटर दूर है। सबसे बड़ी और गहरी बावड़ियों में से एक है। जिसमें सूखे मौसम में पानी तक पहुंचने के लिए लगभग 200 सीढ़ियां हैं। अंग्रेजों के शासन, आधुनिक पानी के पंपों और पाइपलाइनों ने इन्हें अप्रासंगिक बना दिया, जिससे अधिकांश बावड़ियां खंडहर बन गईं और गुमनामी में खो गईं।
नीमराणा की 9 मंजिला बावड़ी अब टूटी-फूटी, गंदी और उपेक्षित है, जिसमें मधुमक्खियों के छत्ते, चमगादड़ हैं। रानी की बावड़ी जैसी कुछ बावड़ियां यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई हैं, लेकिन नीमराणा जैसी अधिकांश बावड़ियों के निर्माण काल और निर्माताओं के बारे में सही जानकारी नहीं है। नीमराना बावड़ी अब भी अपने ऐतिहासिक महत्व और शानदार निर्माण के कारण लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
पूर्व केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री मनोज सिंन्हा ने 29 दिसंबर 2017 को नई दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब में आयोजित समारोह में देश की 16 प्राचीन बावड़ियों पर डाक टिकट जारी किया था। इनमें राजस्थान की छह ऐतिहासिक बावड़ियों को शामिल किया गया है।
Published on:
17 Jun 2024 03:57 pm
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