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राजस्थान का रण: दस साल पहले जिंदगी जैसी थी, आज भी वैसी ही है

डूंगरपुर से अनंत मिश्रा की रिपोर्ट
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जयपुर

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Abdul Bari

Oct 08, 2018

rajasthan ka ran

राजस्थान का रण: दस साल पहले जिंदगी जैसी थी, आज भी वैसी ही है

कपासन से राजसमंद, राजसमंद से उदयपुर और फिर उदयपुर से बस पकड़ कर आदिवासी इलाका डूंगरपुर पहुंचा तो सबकुछ बदला-बदला सा नजर आया। भौगोलिक स्थिति भी और बोली-खानपान भी।

राजसमंद-उदयपुर राजमार्ग पर सड़क किनारे दिखने वाले मार्बल के बड़े-बड़े शो रूम की जगह सड़क के दोनों तरफ खड़े सघन पेड़ों ने ले ली थी। राजमंद-उदयपुर शहरों की चकाचौंध सी गायब होने लगी थी। भव्य इमारतों की जगह कहीं कच्चे तो कहीं अधपक्के मकान दिखाई दे रहे थे। हरियाली के झुरमुट के बीच खेतों में चरती बकरियों का मिमिहाहट साफ सुनाई दे रही थी। लगने लगा था आदिवासी इलाका शुरू हो चुका है।

डूंगरपुर पहुंचा तो ख्याल आया कि आदिवासी गांव का एक फला तो देखना ही चाहिए। सौ अपने सहयोगी विनय सोमपुरा के साथ बाइक पर बैठकर डूंगरपुर-सागवाड़ा मार्ग की राह पकड़ी। दस किलोमीटर चल सरकण घाटी के पास अंदर की सड़क पर आदिवासी तस्वीर झलकने लगी। पहाड़ों पर बने इक्का-दुक्का मकान पानी के कुण्डों से पानी भरती महिलाएं और मछली पकड़ते बच्चे। हिचकोले खाते लोलकपुर पहुंचे तो प्रदेश के दूसरे गांवों और यहांके गांवों का अंतर समझ में आ गया।

अपना एक कमरे का मकान बनाने के लिए कुण्ड से पानी भरकर लाते धूलेश्वर से बात करनी चाही तो अनमना जवाब, हम क्या बताएं। दस साल पहले जिदंगी जैसी थी, आज भी वैसी ही है। रोज कमाते हैं, तब पेट भरता है। विकास की बात मुंह से निकली, तो बेमन से आया जवाब, डूंगरपुर जाने के लिए बस पकडऩी हो तो सात किलोमीटर इसी ऊबड़-खाबड़ रास्ते से पैदल चलकर जाना पड़ता है। आगे चले तो डोजा गांव के रणछोड़ रोत से मुलाकात हो गई। चर्चा छेड़ी तो झुकी आंखों में उम्मीद की किरण चमकी। हमको सरकारी कर्मचारी समझ बैठा। बोला साल भर से किसान कार्ड बनवाने के लिए भटक रहा हूं। छह महीने पहले लकवे से बेसुध हो चुका रोत पंचायत के चक्कर लगा लेता है। कहो, हमारी पहुंच तो वहीं तक है।

आदिवासी इलाके में भी रविवार के बावजूद सरगर्मी अधिक नजर आई। आंतरी गांव पहुंचे तो गिरीश भाई से मुलाकात हो गई। पढ़े-लिखे गिरीश भाई का मानना था कि सरकारी पैसों का आनलाइन ट्रांसफर बड़ी उपलब्धि है। कमीशन खोरी पर रोक लगी है। बोले, आदिवासी इलाके में शराब पर रोक लगाए बिना इसका कल्याण हो ही नहीं सकता। जयंतीलाल जैन ने माना कि पांच साल में काम हुए तो हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। मैंने सवाल दागा कि क्या अब दिल्ली से चले सौ रुपए गांव तक पूरे पहुंच रहे हैं? थोड़ी हिचकिचाहट के साथ जवाब, सौ नहीं तो अस्सी तो पहुंचने ही लगे हैं। पेंशन का पैसा हो, सरकारी अनुदान, सीधे खाते में पहुंच रहा है।

मोटरसाइकिल पर तीन घंटे तक 50 किलोमीटर की दूरी तय करने और लोगों से बातचीत करने पर अहसास हुआ कि काम कहीं दिखता है तो कहीं नदारद। आचार संहिता लागू हो चुकी है लेकिन सरकारी योजनाओं के सरकारी बोर्ड अब भी सड़क किनारे लगे हुए हैं। डूंगरपुर जिले के दस गांवों की खाक छानने के बाद महसूस हुआ कि हर पांच साल में सरकार क्यों बदल रही है?

वर्चस्व बचाने की चुनौती : पिछले चुनाव में डूंगरपुर की चारों सीटें जीतकर भाजपा ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी थी। चौरासी क्षेत्र से सुशील कटारा मंत्री हैं। दोनों प्रमुख दलों में उम्मीदवार को लेकर कयासों का दौर तेज हो गया है। भाजपा में आधे विधायकों के टिकट काटे जाने की चर्चाओं के बीच विधायकों की लामबंदी भी तेज हो गई है। दूसरी तरफ सत्ता में आने के दावे कर रही कांग्रेस की यहां फूंक फूंककर कदम रख रही है।

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