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Rajasthan Nikay Chunav : लग्जरी रिसॉर्ट से लेकर शाही खाने तक, आखिर कांग्रेस-BJP के पास बाड़ाबंदी में खर्च करोड़ों रुपए आते कहां से है?- जानिए

राजस्थान निकाय चुनाव 2026 में बीजेपी और कांग्रेस पार्षदों की बाड़ाबंदी पर करोड़ों खर्च कर रही हैं। जानिए आखिर यह पैसा कहां से आता है और निकाय सत्ता के खेल का पूरा गणित क्या है।
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राजनीतिक बाड़ेबंदी की एक तस्वीर

राजस्थान के 309 शहरी निकायों में वोटिंग प्रक्रिया पूरी होते ही भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने-अपने पार्षद प्रत्याशियों की घेराबंदी यानी 'बाड़ाबंदी' शुरू कर दी है। जयपुर के लग्जरी रिसॉर्ट्स से लेकर अलवर, बाड़मेर और बीकानेर तक प्रत्याशी बसों में भरकर गुप्त स्थानों और महंगे होटलों में शिफ्ट किए जा चुके हैं। जयपुर के तूंगा स्थित रिसॉर्ट में तो सुरक्षा के नाम पर 24 घंटे बाउंसर तैनात हैं। दिलचस्प बात ये है कि एक आम पार्षद प्रत्याशी चुनाव जीतने के बाद सीमित मानदेय पाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनके रहने, खाने, सुरक्षा और ट्रैवल पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।

आम राजस्थान की जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नगर निगम पार्षद के लिए चुनावी खर्च की आधिकारिक सीमा ₹3.5 लाख, नगर परिषद के लिए ₹2 लाख और नगरपालिका के लिए महज ₹1.5 लाख तय है, तो इस फाइव स्टार बाड़ाबंदी के लिए करोड़ों रुपये आखिर कहां से आते हैं और इस पूरे खेल का असली सच क्या है?

लग्जरी रिसॉर्ट, बाउंसर और शाही खाना: बाड़ाबंदी में भारी खर्च

राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के आंकड़ों को देखें तो इस बार 4,852 वार्डों में 18,266 से अधिक प्रत्याशी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वोटिंग के तुरंत बाद क्रास वोटिंग और पोचिंग (सेंधमारी) के डर से दलों ने अपने प्रत्याशियों को तुरंत होटलों में बंद कर दिया है।

अगर पूरे राजस्थान में 100 से ज्यादा निकायों में चल रही बाड़ाबंदी का औसत खर्च निकाला जाए, तो यह आंकड़ा कई करोड़ रुपये पार कर जाता है:

होटल और रिसॉर्ट बुकिंग: जयपुर, उदयपुर और जोधपुर के आसपास स्थित 4-स्टार और 5-स्टार रिसॉर्ट में 50 से 100 कमरों की बुकिंग 3 से 5 दिनों के लिए की जाती है।

भोजन और कैटरिंग: 24 घंटे अनलिमिटेड बफेट, स्नैक्स और विशेष फरमाइशों का खर्च।

सुरक्षा और बाउंसर: किसी भी बाहरी व्यक्ति या विरोधी दल के एजेंट को अंदर जाने से रोकने के लिए प्राइवेट बाउंसरों की तैनाती।

ट्रैवल और लग्जरी बसें: प्रत्याशियों को एक साथ गुप्त स्थान पर ले जाने और वापस लाने के लिए इस्तेमाल होने वाली एसी बसें और एसयूवी गाड़ियां।

बाड़ाबंदी का असीमित पैसा - 4 प्रमुख सोर्स

राजनीतिक विश्लेषकों और ग्राउंड रिपोर्टिंग के आधार पर बाड़ाबंदी में होने वाले भारी-भरकम खर्च के मुख्य रूप से 4 वित्तीय स्रोत होते हैं:

पार्टी का अधिकृत फंड: राजनीतिक दल अपने सांगठनिक चंदे और खातों से कुछ हद तक होटल, ट्रांसपोर्ट और मीटिंग्स का खर्च आधिकारिक रूप से दिखाते हैं।

स्थानीय विधायक और वरिष्ठ नेताओं का पैसा: जिस शहर में बोर्ड बनना होता है, वहां के स्थानीय विधायक, पूर्व विधायक या महापौर/सभापति पद के दावेदार अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए इस खर्च का बड़ा हिस्सा खुद वहन करते हैं।

स्थानीय बिल्डर्स और कारोबारी: निकाय सत्ता से सीधे जुड़े रहने वाले ठेकेदार, रियल एस्टेट डेवलपर्स और बड़े व्यापारी अक्सर पर्दे के पीछे से नेताओं और पार्टियों को फंडिंग करते हैं ताकि बोर्ड बनने के बाद उन्हें व्यावसायिक लाभ मिल सके।

अघोषित/अनौपचारिक फंडिंग: यह सबसे संवेदनशील पहलू है। चुनाव आयोग की तय खर्च सीमा से कहीं ज्यादा होने वाला यह खर्च अक्सर कैश और अघोषित खातों के जरिए मैनेज किया जाता है।

एक पार्षद की कीमत इतनी ज्यादा क्यों?

एक पार्षद को सैलरी के रूप में हर महीने बहुत छोटी रकम मिलती है, लेकिन चुनाव के बाद उसकी राजनीतिक कीमत करोड़ों में क्यों आंकी जाने लगती है? इसकी वजह पार्षद का पद नहीं, बल्कि निकाय के 'बोर्ड' का नियंत्रण है।

मान लीजिए किसी नगर निगम में कुल 100 सीटें हैं। चुनाव नतीजों में किसी एक पार्टी को 48 सीटें मिलती हैं और दूसरी पार्टी को 45 सीटें। अब बोर्ड बनाने और अपना मेयर (महापौर) बैठाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 51 है। इस स्थिति में 3-4 निर्दलीय या छोटे दलों के पार्षद पूरे शहर की सत्ता की चाबी बन जाते हैं।

जिस पार्टी का मेयर बनेगा, पूरे शहर के करोड़ों रुपये के विकास कार्यों, टेंडरों, लैंड यूज़ चेंज (CLU), सफाई ठेकों और प्रशासनिक ट्रांसफर-पोस्टिंग पर उसी का सीधा नियंत्रण होगा। इसी भारी आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण के लिए चुनाव के तुरंत बाद यह बाड़ाबंदी का खेल खेला जाता है।

कानूनी रूप से बाड़ाबंदी गलत है या सही?

कानूनी और तकनीकी दृष्टिकोण से अपने प्रत्याशियों या निर्वाचित पार्षदों को एक साथ किसी रिसॉर्ट या होटल में ठहराना अपने आप में कोई अपराध या भ्रष्टाचार नहीं माना जाता। राजनीतिक पार्टियां हमेशा चुनाव आयोग और अदालत के सामने यह तर्क देती हैं कि वे अपने कार्यकर्ताओं को मानसिक दबाव, डराने-धमकाने या विरोधी दल की सेंधमारी से बचाने के लिए एक साथ रख रही हैं।

हालांकि, अगर इस बाड़ाबंदी के दौरान किसी पार्षद को उसकी इच्छा के विरुद्ध बंधक बनाया जाए, या फिर वोट के बदले सीधे नकद लेनदेन (हॉर्स ट्रेडिंग) के प्रमाण मिलें, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

रिसॉर्ट्स में कैद स्थानीय राजनीति

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे सामने आने तक यह रिसॉर्ट पॉलिटिक्स इसी तरह जारी रहने वाली है। प्रत्याशी नतीजों और वोटिंग प्रक्रिया के अंतिम चरण के बाद ही इन बाड़ों से बाहर निकलेंगे। आम जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले नगर निकायों की कमान किसके हाथ में जाएगी, इसका फैसला तो नतीजे करेंगे, लेकिन चुनाव खत्म होते ही करोड़ों रुपये की इस बाड़ाबंदी ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में पैसों के बढ़ते प्रभाव और ग्राउंड लेवल की राजनीति के कड़वे सच को उजागर कर दिया है।