
पत्रिका फाइल फोटो
Rajasthan News: राजस्थान में स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की अनिवार्यता को खत्म करने की दिशा में सरकार ने कवायद तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार, इस महीने के अंत तक अध्यादेश लाने की पूरी तैयारी है। पंचायती राज विभाग और स्वायत्त शासन विभाग ने विधि विभाग को अलग-अलग प्रस्ताव भेज दिए हैं। विधि विभाग से मंजूरी मिलते ही मामला कैबिनेट के सामने रखा जाएगा और कैबिनेट की मुहर लगने के बाद अध्यादेश जारी हो जाएगा।
इस संशोधन के बाद पंचायती राज अधिनियम और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम में 30 साल पुराना वह प्रावधान खत्म हो जाएगा, जिसके तहत दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवार चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित हो जाता था। 1995 में तत्कालीन भैरों सिंह शेखावत सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से यह नियम लागू किया था। अब सरकार इसे पूरी तरह हटाने जा रही है, जिससे तीन या उससे अधिक बच्चों वाले नेता भी सरपंच, पार्षद, नगरपालिका चेयरमैन से लेकर जिला परिषद सदस्य तक का चुनाव लड़ सकेंगे।
संविधान के अनुसार, कोई भी अध्यादेश छह महीने के अंदर विधानसभा में बिल के रूप में पेश करना और पारित करवाना जरूरी होता है। राजस्थान में शीतकालीन सत्र दिसंबर के तीसरे-चौथे सप्ताह में होने की संभावना है, लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि सरकार बजट सत्र (फरवरी-मार्च 2026) में ही दोनों संशोधन बिल पेश करना चाहती है। यदि ऐसा हुआ तो पंचायत और निकाय चुनाव कई महीने आगे खिसक सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में चुनाव आयोग इन चुनावों की तैयारी कर रहा है और मौजूदा कानून के तहत दो बच्चों की शर्त अभी भी लागू है।
दो बच्चों की पाबंदी हटने से राजस्थान की ग्रामीण और शहरी राजनीति में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों में जिलास्तर पर सैकड़ों ऐसे नेता हैं, जिनके तीन या अधिक बच्चे हैं और वे वर्षों से चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, बीकानेर, अजमेर समेत सभी जिलों में ऐसे प्रभावशाली चेहरे मौजूद हैं। इन नेताओं को अब सीधे मैदान में उतरने का मौका मिलेगा, जिससे टिकट वितरण से लेकर गठबंधन तक सब कुछ प्रभावित होगा।
दो बच्चों का नियम हटाने की मांग पिछले डेढ़ दशक से जोर पकड़ रही थी। विभिन्न सामाजिक संगठनों, बहु-संतान परिवारों और राजनीतिक दलों के नेताओं ने मुख्यमंत्री, मंत्री और विभागीय अधिकारियों को सैकड़ों ज्ञापन सौंपे थे। कई संगठनों ने इसे 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन' बताया था। बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी पार्टी हाईकमान से इस मुद्दे को उठाया था। आखिरकार, वर्तमान गहलोत सरकार ने इसे गंभीरता से लिया और प्रक्रिया शुरू कर दी।
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव जनवरी-फरवरी 2026 में कराने की तैयारी की थी, जबकि निकाय चुनाव मार्च-अप्रैल 2026 में प्रस्तावित थे। लेकिन अध्यादेश के बावजूद विधानसभा से बिल पास होने तक नई व्यवस्था लागू नहीं हो पाएगी। अगर बजट सत्र में बिल पास होता है तो चुनाव मई-जून 2026 तक खिसक सकते हैं। इससे मतदाता सूची अद्यतन, आरक्षण प्रक्रिया और नामांकन तारीखों में भी बदलाव होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यादेश के जरिए तत्काल राहत मिल जाएगी, लेकिन स्थायी समाधान के लिए विधानसभा की मुहर जरूरी है। वहीं, जनसंख्या नियंत्रण के समर्थक इसे गलत कदम बता रहे हैं। उनका तर्क है कि 1995 में यह नियम जनसंख्या विस्फोट रोकने के लिए लाया गया था और इसे हटाना उचित नहीं। दूसरी ओर, सामाजिक संगठन इसे “लोकतंत्र की जीत” बता रहे हैं।
Published on:
07 Nov 2025 06:20 pm
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