'नेता एक शरीर है, कुर्सी उसकी आत्मा, उसका ज्ञान और अनुष्ठान'

'नेता एक शरीर है, कुर्सी उसकी आत्मा, उसका ज्ञान और अनुष्ठान'

kamlesh sharma | Publish: Nov, 11 2018 07:30:00 AM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

चुनाव का टिकट से टिकट का नेता से, नेता का कुर्सी से गहरा संबंध है। नेता एक शरीर है कुर्सी उसकी 'आत्मा'।

अजहर हाशमी

चुनाव का टिकट से टिकट का नेता से, नेता का कुर्सी से गहरा संबंध है। नेता एक शरीर है कुर्सी उसकी 'आत्मा'। शरीर कभी नहीं चाहता कि आत्मा उसे छोड़े। नेता कभी नहीं चाहता कि कुर्सी उससे मुंह मोड़े। कुर्सी नेता का ध्यान है। कुर्सी नेता का ज्ञान है। कुर्सी नेता का बयान है। कुर्सी नेता का ईमान है। कुर्सी नेता का अनुष्ठान है। कुर्सी नेता का भगवान है।

कुर्सी न हो तो नेता उबलता है। कुर्सी देखते ही नेता मचलता है। कुर्सी मिलते ही नेता मुस्कुराता है। कुर्सी हिलते ही नेता खिसियाता है। कुर्सी से ही नेता को माल मिलता है। कुर्सी के लिए नेता चाल चलता है। कुर्सी नेता के लिए थाल है।

कुर्सी नेता के लिए ढाल है। चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर नेता दल बदलने का दांव दिखाता है। इसीलिए राजनीति को दलदल कहा जाता है। तात्पर्य यह कि टिकट मिलता है तो नेता के चेहरे की चमक बढ़ जाती है। टिकट कटता है तो नेता की मुख-मुद्रा बिगड़ जाती है। टिकट का नहीं मिलना नेता के मन पर आघात करता है इसलिए वोटिंग के दिन वह भितरघात करता है। दल बदलकर जब नेता दूसरे दल में चला जाता है, तब उसका फौरन बयान आता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इस तर्क से दल-बदल के औचित्य को समझता है।

दल-बदल के संदर्भ में अपनी नाक ऊंची रखने के लिए (हालांकि यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि नेता के नाक होती है या नहीं) नेता का कथन यही होता है कि जब प्रांत का नाम बदला जा सकता है, शहर का और यहां तक की गांव का भी तो दल क्यों नहीं बदला जा सकता। अभिप्राय यह कि चुनाव के लिए टिकट जहां भी मिले लेकर आओ। दल बदल कर मीडिया की सुर्खियां बटोरते जाओ। टीवी चैनलों पर चेहरा दिखलाओ। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा तो कुर्सी पाओ।


बात लौटकर फिर वहीं आती है कि कुर्सी नेता को बहुत भाती है। इसीलिये मैंने कहा कि नेता एक शरीर है, कुर्सी उसकी 'आत्मा' कुर्सी नेता की चाहत है। इसलिए भाषण नेता की आदत है। किसी नेता का भाषण 'जुमलेबाजी' का लॉलीपॉप होता है।

किसी नेता का भाषण 'कन्फ्यूजन' की शॉप (दूकान) होता है। जिस प्रकार जीजा को ***** प्रिय होती है, उसी तरह नेता को ताली प्रिय होती है। उधर नेता के भाषण पर ताली पड़ती है। उधर नेता के चेहरे पर लाली बढ़ती है। कभी-कभी तो भाड़े पर बुलाई गई भीड़ में नेता के भाषण पर इतनी तालियां बजती हैं कि समझ में नहीं आता कि भाषण पर तालियां हैं या तालियों पर भाषण ! वह तो खबरखोजी मीडिया से बाद में पता चलता है कि नेता के भाषण में भीड़ प्रायोजित थी, अत: तालियां भी प्रयोजित थीं।

जब कोई नेता चाटुकारों की कंफूस (चापलूसों की चौकड़ी) में सिमट जाता है। तब अगले चुनाव में मतदाताओं के वोट से निपट जाता है। रेतीले पथ पर जिस तरह तेज गति से दौड़ती हुई गाड़ी फिसलती है, उसी तरह बयान देने की जल्दी में नेता की जुबान फिसलती है। नेता बयान देकर जब परिणाम विकट पाता है तब अपने ही दिए हुए बयान से पलट जाता है।

आशय यह कि नेता अपनेे ही बयान से अपना नाता तोड़ता है बयान में तोड़-मरोड़ का ठीकरा मीडिया के माथे पर फोड़ता है। नेता यह सब कारस्तानियां कुर्सी के लिए करता है फिर नाटकीयता से स्वयं के निर्दोष होने का दम भरता है। और अंत में यक्ष-प्रश्न
यक्ष: कुर्सी पाते ही नेता क्या हो जाता है ?

युधिष्ठिर : फूला हुआ गुब्बारा
यक्ष : कुर्सी खोते ही नेता क्या हो जाता है?
युधिष्ठिर : सूखा हुआ छुआरा।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

खबरें और लेख पड़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते है । हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते है ।
OK
Ad Block is Banned