
जयपुर।
देश आज प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति व भारत रत्न सम्मानित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहा है। वर्ष 1963 में आज ही के दिन उन्होंने अपनी देह त्यागी थी। जीवन के आखिरी दिनों में वे बिहार की राजधानी पटना के नज़दीक सदाकत आश्रम में रहे थे। पुण्यतिथि पर आज हो रहे विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करने के साथ उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।
गौरतलब है कि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नामी वकील थे। वर्ष 1917 में चंपारण आंदोलन के साथ ही महात्मा गांधी के संपर्क में आए और उनका जीवन देश को समर्पित हो गया। अपने घर-परिवार का काम छोडक़र वे महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी की सेवा में ही लग गए थे।
राजस्थान से रहा ख़ास नाता
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का राजस्थान से भी गहरा और ख़ास नाता रहा है। अपने जीवनकाल और राजनीतिक करियर के दौरान वे यहां कई यहां बार आ चुके हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने काफी वक्त मरुधरा में भी अपना जीवन व्यतीत किया था।
सीकर में लिया था स्वास्थ्य लाभ
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सांस और दमा की तकलीफ से बहुत परेशान रहा करते थे। इस वजह से वे एक बार बहुत ज्यादा बीमार पड़ गए थे। इसके चलते वे सीकर में आराम करने के लिए रुके। बताते हैं कि उन्हें यहां स्वास्थ्य लाभ मिला था।
एक नहीं, दो बार रहे राजस्थान
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए पहली बार वर्ष 1940 में सीकर आए थे। इसके बाद दूसरी बार वर्ष 1946 में भी राजस्थान आकर ही स्वास्थ्य लाभ लिया था। दोनों ही बार उन्हें राजस्थान आकर आराम मिला। जानकार बताते हैं कि दमा, अनियमित दिनचर्या और अत्यधिक मेहनत के कारण उनका स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता था। राजस्थान की जलवायु शुष्क होने के कारण वे यहीं पर रुककर स्वास्थ्य लाभ लेते थे।
राजस्थान में ही लिखी आत्मकथा
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राजस्थान से बड़ा स्नेह करते थे। सुखद संयोग है कि उन्होंने आत्मकथा लिखने की शुरुआत सीकर में की थी और समापन भी यहीं पिलानी में किया था। जानकारी के अनुसार वर्ष 1940 में उनका स्वास्थ्य खराब हुआ था और बजाज समूह के संस्थापक उद्यमी-समाजसेवी सेठ जमनालाल बजाज उन्हें अपने साथ सीकर में अपने 'काशी का बास' गांव ले आए थे।
बताते हैं कि राजेन्द्र प्रसाद को आत्मकथा लिखने के लिए उनके शुभचिंतक काफी समय से उनसे आग्रह कर रहे थे। आखिरकार उन्होंने पिलानी में स्वास्थ्य लाभ लेने के दौरान आत्मकथा लिखना शुरू किया।
'गुपचुप' लिखा करते थे आत्मकथा
डॉ राजेंद्र प्रसाद सुबह सभी के उठने से पहले ही लेखन कार्य किया करते थे। उनके सचिव तक को भी कई दिन बाद पता चला कि राजेन्द्र प्रसाद कुछ लिख रहे हैं। बाद में आत्मकथा का बड़ा हिस्सा उन्होंने जेल में रहते लिखा और अंतत: पिलानी आकर ही स्वास्थ्य लाभ करते हुए अपनी लगभग 755 पेज की आत्मकथा का समापन किया। खास बात यह थी कि उनकी आत्मकथा मूल रूप से हिन्दी में ही लिखी गई।
Published on:
28 Feb 2023 01:43 pm
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