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Rajesh Pilot : इस जांबाज़ ‘बॉम्बर पायलट’ ने PAK से जंग में छुड़ाए थे दुश्मन के छक्के, पढ़ें रोचक किस्से और जानकारियां

Rajesh Pilot Mizoram Bombing Controversy : भारतीय वायुसेना से लेकर भारतीय राजनीति तक में अपनी ख़ास पहचान रखने वाले स्वर्गीय राजेश पायलट एक बार फिर सुर्खियों में हैं। भाजपा नेता अमित मालवीय के एक ट्वीट में पुरानी घटना के ज़िक्र होने से ये विषय एक बार फिर गरमाने लगा है। नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोपों के बीच पेश है राजेश पायलट के जांबाज़ी के रोचक किस्से और जानकारियां

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जयपुर।

भारतीय वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर से लेकर भारतीय राजनीति के ज़रिये जनसेवा तक, स्वर्गीय राजेश पायलट ने अपने जीवन काल के दौरान के दौरान एक अलग ही पहचान बनाई। उनका असल नाम राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी था। वे हालिया ग्रेटर नोयडा (पश्चिम) के एक छोटे से गांव वैदपुरा में जन्में थे।

बिधूड़ी गुर्जर समाज के इस शख्स ने युवावस्था के शुरूआती काल में ही भारतीय वायु सेना ज्वाइन कर ली। इतनी कम उम्र में सेना में शामिल होने वाले पूरे गांव में राजेश सबसे युवा थे, यही कारण रहा कि उनकी इस उपलब्धि से ना सिर्फ उनका परिवार ही खुश था, बल्कि पूरे गांव में जश्न मनाया गया था। इसी कारण राजेश पायलट की एक अलग पहचान भी बनी और वे लोगों के बीच चर्चित भी हुए।

पायलट से जोइनिंग, फ्लाइट लेफ्टिनेंट पर प्रमोट

जानकारी के अनुसार राजेश पायलट को 29 अक्टूबर 1966 को पायलट ऑफिसर के रूप में भारतीय वायु सेना में एंट्री मिली थी। उन्हें जनरल ड्यूटी (पायलट) शाखा में नियुक्त किया गया था। इसके ठीक एक साल बाद 29 अक्टूबर 1967 को वे फ्लाइंग ऑफिसर पद पर प्रमोट हुए थे। राजेश पायलट को इसके बाद 29 अक्टूबर 1971 को फ्लाइट लेफ्टिनेंट और 29 अक्टूबर 1977 को उन्हें स्क्वाड्रन लीडर के रूप में पदोन्नत किया गया था।

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पाकिस्तान को दिया था करारा जवाब

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी राजेश पायलट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युद्ध के लिए उन्हें एक बमवर्षक पायलट के रूप में शामिल किया गया था। जंग के दौरान उन्होंने अपनी इस काबिलियत का लोहा मनवाया था और दुश्मन को करारा जवाब दिया था।

कनाडाई विमान उड़ाने में थी महारथ

राजेश पायलट खासतौर से भारतीय वायुसेना में शामिल 'डी हैविलैंड कनाडा डीएचसी-4 कारिबू' उड़ाने के महारथी थे। ये एक कनाडाई विशेष कार्गो विमान था जिसमें शॉर्ट टेकऑफ़ और लैंडिंग क्षमता थी। इसे पहली बार 1958 में उड़ाया गया था, हालांकि बाद में इसे सैन्य अभियानों से सेवानिवृत्त कर दिया गया था।

सेना छोड़ राजनीति में प्रवेश

1979 के आखिर में, राजेश पायलट ने सेना से तब इस्तीफा दिया जब वे जैसलमेर में पोस्टेड थे। पूर्व के इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्होंने अपने मित्र राजीव गांधी के प्रभाव में आकर राजनीति के ज़रिए जनसेवा करने का फैसला लिया था। अगले ही वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में पायलट ने भरतपुर से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और उसी समय अपना उपनाम बदलकर पायलट रख लिया।

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इस्तीफे के बाद भी जारी रही सेवाएं
वायु सेना छोड़ देने के बाद जब राजेश पायलट 1988 में नीदरलैंड की एक आधिकारिक यात्रा पर गए थे, तब डच वायुसेना ने उनके लिए RNLAF F-16 उड़ाने की विशेष व्यवस्था की थी। बाद में तो भारतीय वायुसेना ने भी राजेश पायलट के भारत लौटने पर सेवाएं लीं और बेड़े में शामिल हुए नए मिग-29 का परीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया था।

मिजोरम बमबारी को लेकर विवाद

राजेश पायलट ने मिजोरम पर बमबारी की थी या नहीं इसे लेकर एक बार फिर बहस गरमा गई है। भाजपा के आरोपों को राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट ने भ्रामक करार देते हुए खारिज किया है। लेकिन इस घटना से जोड़कर राजेश पायलट की भूमिका का ज़िक्र पहले भी कई बार हो चुका है। स्व. राजेश पायलट की विकिपीडिया में साझा जीवनी में इस विवाद को लेकर बाकायदा एक अलग से कॉलम दिया गया है।

मणिपुर बम विस्फोट विवाद के उप-शीर्षक से दी गई जानकारी में बताया गया है कि स्थानीय लोगों के दावे के अनुसार राजेश पायलट और सुरेश कलमाड़ी उन पायलटों में से एक थे, जिन्होंने मार्च 1966 में मिज़ो नेशनल फ्रंट विद्रोह के दौरान मणिपुर विद्रोहियों पर बमबारी की थी। इस मुद्दे का जिक्र अगस्त 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा में किया था।

राजेश पायलट : कुछ और ख़ास बातें


- 10 फरवरी 1945 को जन्म


- लोकसभा चुनाव में दौसा संसदीय सीट से कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव लड़े। कई बार सांसद रहे।


- 1980 में भरतपुर से सांसद, फिर 1984,1991,1996,1998 एवं 1999 दौसा से रहे सांसद। 20 साल तक सांसद रहे।

- 1984 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया


- गुर्जर समाज में मजबूत पकड़, वर्षों तक रहा दबदबा


- 1974 में रमा पायलट से शादी हुई


- बताते हैं कि कश्मीर में सामान्य स्थिति लाने के लिए उन्होंने भी काफ़ी कोशिश की, हाँलाकि वहाँ उन पर कई हमले भी हुए


- 11 June 2000 को जयपुर के नज़दीक कार एक्सीडेंट में मौत, वे खुद कार ड्राइव कर रहे थे, उनकी उम्र तब मात्र 55 वर्ष थी।

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