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राजस्थान में क्यों बढ़ रहा है सियासी पारा, किस किस की बढ़ रही है धड़कनें

राजस्थान के बढ़ते सियासी पारे ने न सिर्फ भाजपा बल्कि कांग्रेस नेताओं की भी बढ़ा रखी है धड़कनें

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जयपुर

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Suresh Vyas

Mar 17, 2018

Rajasthan Politics

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जयपुर। गर्मी का मौसम अभी शुरू ही हुआ है, लेकिन रोजाना बढ़ रहा सियासी पारा राजस्थान के कई नेताओं के पसीने छुड़ाने लगा है। राज्य में हुए तीन उपचुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की करारी हार के बाद जहां एक और मंत्रिमंडल और राज्य के पार्टी संगठन में बदलाव की चर्चाओं ने सियासी पारा चढ़ा रखा है, वहीं पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनावों तगड़ी पटखनी खाने के बाद ठंडे बस्ते में जा गिरे प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के लिए उपचुनावों की जीत तो संजीवनी का काम कर रही है, लेकिन अंदरखाने चल रही खींचतान के कारण कांग्रेस के नेता भी पसीने से तरबतर नजर आ रहे हैं।

प्रदेश में दरअसल सियासी पारा चढ़ने का क्रम जनवरी की भरी सर्दी में ही शुरू हो गया था, जब भाजपा ने अलवर व अजमेर की संसदीय और भीलवाड़ा जिले में मांडलगढ़ विधानसभा सीटें गंवा दी। राज्य में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये उपचुनाव कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए लिटमस टेस्ट थे। तीनों उपचुनावों को मिलाकर सत्रह विधानसभा क्षेत्रों के मतदाताओं ने वोट डाले और एक भी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा अपनी बढ़त तक बरकरार नहीं रखनी पड़ी। वैसे भाजपा की शहरी मतदाताओं पर शुरू से पकड़ रही है, लेकिन इन चुनावों में तो भाजपा को शहरों में भी हार का मुंह देखना पड़ा। करीब दो दशक बाद अजमेर उत्तर जैसी भाजपा की परम्परागत सीट पर हार ने भाजपा को जैसे अंदर तक हिला दिया। भाजपा ने प्रदेश में इससे पहले हुए चार विधानसभा उपचुनाव में से तीन में हार का सामना किया था, लेकिन पहली बार महसूस हुआ कि इस बार के उपचुनाव में भाजपा को कोई झटका लगा है। इस झटके की वजह से ही पिछले दो महीनों से भाजपा की अंदरूनी राजनीति गर्माई हुई है और लगातार मंथन बैठकों का दौर चल रहा है। अब तो बात मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल और दो उपमुख्यमंत्री बनाने तक जा पहुंची है।

केंद्रीय नेतृत्व तक सकते में
उपचुनाव में भाजपा की हार से केंद्रीय नेतृत्व तक सकते में है। इससे पहले चाहे विधानसभा के उपचुनाव की हार हो या स्थानीय निकायों व पंचायतों के उपचुनाव में कांग्रेस को लगातर मिल रही जीत का प्रश्न हो, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने गिनार तक नहीं की थी, लेकिन इस बार की हार ने केंद्रीय नेतृत्व तक को हिला दिया। उपचुनावों के नतीजों के पहले दिन से ही प्रदेश भाजपा नेतृत्व में बदलाव की चर्चा चल रही है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कैबिनेट तक में बदलाव की बातें हो रही है। दरअसल, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी अहसास होने लगा है कि राजस्थान में कुछ ठीक नहीं चल रहा। राज्य सरकार के प्रति लोगों का गुस्सा चुनाव में हार के रूप में सामने आ रहा है। इसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 8 मार्च को शायद झुंझुनूं में राष्ट्रीय पोषण अभियान व बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के शुभारंभ समारोह में महसूस किया। मुख्यमंत्री के भाषण के बीच में नारेबाजी को जनता की नाराजगी के रूप में लिया गया। इसके बाद से ही केंद्रीय नेतृत्व हालात सुधारने की दिशा में सक्रिय नजर आ रहा है।

मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में मंत्रियों से चर्चा
भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में 16 मार्च को केंद्रीय सह संगठन मंत्री वी सतीश व संगठन महामंत्री चंद्रशेखर ने अचानक राज्य मंत्रिमंडल के सदस्यों को तलब किया। उनसे फीडबैक लिया गया। इस बैठक के बाद से ही मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है। लेकिन सियासी पारा मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी में मंत्रियों को बुलाकर चर्चा करने को वसुंधरा के प्रति मंत्रियों की नाराजगी का पैमाना मापने के रूप में भी देखा जा रहा है। वैसे इस बैठक में मंत्रियों ने कार्यकर्ताओं के काम नहीं होने का ठीकरा ब्यूरोक्रेसी के सिर पर फोड़ा है।

कांग्रेस भी कम आशंकित नहीं
ऐसा नहीं है कि चुनावों को लेकर भाजपा में ही धुकधुकी मची है। कांग्रेस भी कम आशंकित नहीं है। कांग्रेस हालांकि एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर के सहारे नैय्या पार लगने की उम्मीद पालकर बैठी है, लेकिन एक तरफ भाजपा की तेजी से डैमेज कंट्रोल की कोशिशें और कांग्रेस में नेतृत्व के सवाल ने कांग्रेस की आशंकाओं को बढ़ाया है। ऊपरी तौर पर तो कांग्रेस के नेता एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन मौका पड़ते ही इसमें कहीं न कहीं झोल दिख ही जाता है। कांग्रेस महाधिवेशन के मौके दिल्ली के राजस्थान भवन में प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट की मेजबानी में हुए रात्रि भोज में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सीपी जोशी सरीखे नेताओं का कुछ देर रुक कर चले जाने पर कुछ प्रेक्षकों ने रस्म अदायगी कहते हुए खींचतान पर इशारा कर दिया। हो सकता है कि गहलोत और जोशी के राष्ट्रीय महासचिव के नाते महाधिवेशन की जिम्मेदारियों के चलते भी जल्दी निकल गए हों।


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