
She News - लुप्त होती लोक कला के प्रति कर रहीं जागरूक
आदिवासी या लोक कला के प्रति आमजन का रुझान बढ़ाने और उन्हें संरक्षित करने का प्रयास कर रही हैं मंजू भाटिया , उन्होंने पेंटिंग की प्रोफेशनल Traning नहीं ली लेकिन ट्राइबल आर्ट के प्रति रुझान के चलते इस क्षेत्र में आ गईं। मंजू बताती हैं कि पति का ट्रांसफर होता रहता था इसलिए वह सेंट्रल स्कूल में कॉन्ट्रेक्ट पर टीचिंग कर रही थीं। साथ ही खाली समय में पेंटिंग करती थीं, उनकी पेंटिंग देखकर दोस्तों ने उन्हें इस फील्ड में आने की सलाह दी।
ऑनलाइन तैयारी: मंजू कहती हैं कि दोस्तों का रिस्पॉन्स सुनकर उन्होंने बनारस में रहते हुए ऑनलाइन क्लास लेना शुरू किया। जिसमें 3 से 7 साल की आयु वर्ग के बच्चे जुड़े। स्टूडेंट्स जिस आर्ट को सीखने में रुचि दिखाते थे, मंजू पहले खुद उसके बारे में पता करने के लिए उस कला में काम कर रहे स्थानीय कलाकारों से सम्पर्क कर जानकारी लेतीं फिर स्टूडेंट्स को बतातीं। उनकी क्लास में यूएस और ऑस्ट्रेलिया से भी स्टूडेंट्स जुड़े हैं। वह प्रतिदिन रविवार को निशुल्क कक्षाएं भी संचालित करती हैं। ताकि आमजन इन कलाओं के बारे में जान सके।
इन कलाओं में महारत हासिल
मंजू केवल मधुबनी पेंटिंग ही नहीं करती, उन्हें गौंड, संथाल, चेरियाल, पिछवई, कवि आर्ट, सांझी, फड़, कलमकारी, मसाई आदि में भी महारत हासिल है। उत्तरप्रदेश ललित कला अकादमी की ओर से उन्हें राज्य स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। इंटरनेशनल ऑनलाइन आर्ट कॉम्पटिशन में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। ऑल इंडिया आर्ट फेस्टिवल सहित देश भर की विभिन्न अकादमियों और अन्य मंचों पर उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनी लग चुकी है। उनका कहना है कि वह लुप्त होती लोक कला के प्रति युवा पीढ़ी को जागरूक करने का प्रयास कर रही हैं।
बना रहीं आत्मनिर्भर
मंजू न केवल कलाकार हैं बल्कि वह अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना रही हैं। इसके लिए उन्होंने आर्ट स्टूडियो की शुरुआत की है। जिसमें ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को जोड़ा गया है। इन महिलाओं से विभिन्न प्रकार के कपड़े तैयार करवाकर उन पर वह ट्राइबल आर्ट करती हैं और इनकी बिक्री से होने वाली आय का एक हिस्सा इन महिलाओं को दिया जाता है।
Published on:
22 Feb 2024 03:31 pm
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