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चौमूं में आज सुबह 'पीला पंजा' पूरी गरज के साथ बरसा है। 25 दिसंबर की रात को हुए बवाल और पत्थरबाजी की घटना के बाद प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए बस स्टैंड और मस्जिद क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। तोड़ फोड़ की कार्रवाई को देख अतिक्रमणकारियों में हड़कंप मच गया।
इस दौरान चप्पे-चप्पे पर तैनात 300 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के साये में अवैध दुकानों, सीढ़ियों और रैंपों को ध्वस्त किया जा रहा है।
सुबह जब नगर परिषद का दस्ता बुलडोजर लेकर सड़क पर उतरा, तो पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। सुरक्षा के मद्देनजर चौमूं, हरमाड़ा और दौलतपुरा सहित कई थानों की पुलिस फोर्स को तैनात किया गया है।
एडिशनल डीसीपी राजेश गुप्ता खुद कमान संभाले हुए हैं। पुलिसकर्मी सिर पर हेलमेट, लाठी और सेफ्टी जैकेट पहनकर दंगाइयों और उपद्रवियों पर नजर रख रहे हैं। पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया है ताकि 25 दिसंबर जैसी हिंसा की पुनरावृत्ति न हो।
विवाद की जड़ 25 दिसंबर की रात की घटना है। बस स्टैंड क्षेत्र में कलंदरी मस्जिद के बाहर लोहे की रेलिंग लगाने और लंबे समय से पड़े पत्थरों को हटाने को लेकर दो पक्ष आमने-सामने आ गए थे।
प्रशासन का कहना है कि ये पत्थर और रेलिंग सड़क सीमा में अतिक्रमण थे, जिससे सालों से ट्रैफिक जाम की समस्या बनी हुई थी। उस रात बातचीत के दौरान अचानक पथराव शुरू हो गया, जिसमें पुलिस और नगर परिषद की टीम को निशाना बनाया गया था।
नगर परिषद ने इस बार केवल पत्थरबाजी वाले स्थान को ही नहीं, बल्कि आसपास चल रही अवैध मीट की दुकानों को भी निशाने पर लिया है। परिषद ने स्पष्ट किया कि बिना स्थान स्वीकृति के नॉनवेज की दुकानें संचालित करना और सड़क पर अवैध रैंप बनाना कानूनन अपराध है। कुरेशी लियाकत अली सहित कई संचालकों को पहले ही नोटिस दिए गए थे। नोटिस में साफ चेतावनी थी कि यदि 31 दिसंबर तक अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो ध्वस्तीकरण का खर्च भी दुकानदारों से ही वसूला जाएगा।
कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए चौमूं के पूर्व विधायक रामलाल शर्मा ने कहा कि पत्थरबाजी करने वालों की हिम्मत तोड़ने के लिए यह एक्शन जरूरी था। जो लोग कानून को हाथ में लेते हैं, उनके खिलाफ यह कार्रवाई पूरे राजस्थान में एक नजीर पेश करेगी।
नगर परिषद आयुक्त के अनुसार यह कार्रवाई नियमों के दायरे में रहकर की गई है। प्रभावितों को तीन बार नोटिस दिए गए थे और जवाब पेश करने के लिए 31 दिसंबर तक का समय दिया गया था।
जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला और डेडलाइन खत्म हो गई, तब जाकर बुलडोजर चलाने का फैसला लिया गया। हालांकि कुछ स्थानीय दुकानदारों ने आरोप लगाया कि उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया और अचानक कार्रवाई से उन्हें बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है।
Updated on:
02 Jan 2026 10:35 am
Published on:
02 Jan 2026 10:22 am
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